Thursday, 8 November 2018

सहृदयता

Mine 8 Nov 2017 post:

सहृदयता ..

अशोकवाटिका में सीताजी को कष्ट सहते देख देवलोक में देवी पार्वती को अपार व्यथा होती और वह शंकर भगवान से इसके निवारण को कहतीं। उनकी यह व्यथा सीताजी के प्रति सहृदयता है। अर्थात सहृदयता एक दैवीय गुण है। वर्तमान समय में भी कुछ लोग सहृदयता सम्पन्न हैं व दूसरों के दुःख में साथ देने का प्रयास करते रहते हैं। नोबल शांति पुरस्कार से सम्मानित कैलाश सत्यार्थी ऐसे ही एक सहृदय भारतीय हैं जिनका जीवन बच्चों का जीवन बेहतर बनाने लिए समर्पित है जिसके लिए वह विश्व के 150 देशों के 83000 से अधिक बच्चों के लिए कार्य कर चुके हैं। कुछ अन्य लोग भी अपने क्षेत्र में इसी सहृदयता से कार्य करते रहते हैं। ऐसे व्यक्ति निश्चय ही औरों को शीतल छाया देने वाले विशाल वृक्ष की तरह हैं। दूसरी ओर, बेल अथवा कमज़ोर लताओं की यह प्रवृति अथवा विवशता है कि वे अपने निकटतम पेड़ के तने से लिपट जाती हैं।। अपने कार्य के प्रति समर्पित रहते हुए अपने कार्यक्षेत्र व अपने असंख्य कर्मचारियों के जीवन में परिवर्तन लाने का भाव श्री अश्वनी लोहानी के व्यक्तित्व में भी सहज देखा जा सकता है। उनकी कोई पोस्ट किसी भी विषय अथवा कार्य से संबंधित क्यों न हो, अनेकानेक कर्मचारी अपनी व्यक्तिगत समस्याएं उनके सम्मुख ले आते हैं। एक साधारण कर्मचारी अपने सीएमडी को अपनी पहुंच की सीमा में देखकर भावविभोर हो जाता है। यह 'अनौपचारिक मिलन'  उनकी सहृदयता ही है। औपचारिक रूप में (अंग्रेजों के समय के) 'थ्रू प्रॉपर चैनल' नियमानुसार न चलना तो स्वयं ही अनुशासनात्मक कार्रवाई के अंर्तगत आता है। शायद आज भी एक कर्मचारी अपनी कोई शिकायत एक-दो स्तर ऊपर तक ही कर सकता है। विन्रम निवेदन करूंगा, कोई भी कर्मचारी अपनी किसी शिकायत अथवा आवेदन आदि की प्रितिलिपि सीएमडी को भी सूचनार्थ भेजने को स्वतंत्र होना चाहिए ताकि एक न्यनतम अवधि तक निचले स्तर पर कोई कार्यवाही न होने पर वह उनसे मिल सके।। अंत में, जैसा व्यवहार हम औरों से चाहते हैं, हमें भी अपने संपर्क में आए लोगों से करना चाहिए। यदि हम सब मात्र अपने एक-एक निकटवर्ती घर के किसी दुःख में सहायक होने लगें तो स्वयं ही एक खुशनुमा समाज बन जाएगा!