Tuesday, 31 January 2017

Second Innings

Second Innings : Sitting idle!

बाई गॉड की कसम -- बस, मौहल्ले में आवाज़ लगाने की कसर रह गई: "कुछ काम करा लो!"

'फुर्र'


हो गई न मैं 'फुर्र'..! सब समझे थे मेरे स्कूल दाखिले के लिए फोटो है!!  
  
(3.12.2016 : मेक्सिको)

- बुरा मान गए?

किसी विवाह या पार्टी आदि में जहां होस्ट अनेक भव्य आयोजन करता है, वहीं एक शानदार बैग का प्रबंध भी। अब, देखो, कितने भी आवरण से ढक लो, भीतर तो 'उम्मीद' जैसा ही कोई शब्द मिलेगा। कुछ-न-कुछ अपेक्षा तो मानव-मन करता ही है। फिर दस्तूर भी है। हमारी अपनी टैग-लाइन "जो न दे उसका भी भला" यहां दम तोड़ती नज़र आती है। (दो हज़ार प्रति प्लेट तो मान ही लो।) अब गेस्ट और उनके लिफाफे भी कई तरह के होते हैं - औसतन 251 से 5001 का लिफाफा मान लेते हैं जिनके आधार पर क्रमशः भावी संबंध तय होते हैं। 1100 सामान्य, 2100 प्रिय, 3100 अतिप्रिय और 5100 या अधिक शायद प्रियवर की श्रेणी में आ जाते हैं। 501 तक वालों का नाम तो अगली लिस्ट में डाला जाना ही संदिग्ध हो जाता है। होस्ट भी बेचारा क्या करे! मियां-बीवी तीन बच्चों को साथ ले आए तो कहना ही पड़ता है: "पांच प्लेटें अलग लगवा दें?" वस्तुतः उनके हाथ जोड़ कर कहने का तात्प्रय होता है कि कृपया दो-तीन प्लेट में ही काम चला लें। ..हमारे बारे में? हम तो, सच, लिफाफे पर अपना नाम ही नहीं लिखते; अलबत्ता लिफाफा थमाते हुए फोटो ज़रूर खिंचवा लेते हैं और 'प्रियवर' लिस्ट में बने रहते हैं!

Sunday, 29 January 2017

डमर बहादुर

स्कूल शुरू हुए कुछ समय बाद डमर बहादुर ने हमारी पहली क्लास में दाखिला लिया था। पहले ही दिन उसे एक थप्पड़ पड़ गया था। मैडम जी को उसने 'मौसी जी' कह दिया था। छुट्टी होने पर मैंने उसे ढाढ़स बंधाया। घर का पता पूछने पर पता चला कि उसका घर भी हमारे रेलवे क्वार्टर के किसी अलग ब्लॉक में है। उसके पिता चौकीदार थे। अपने नाम के मुताबिक वह खुद भी बहुत बहादुर था। मैं भी उससे डरता पर पढ़ाई में उसका ध्यान रखता। एक दिन उसने क्लास में एक इंच जितनी छोटी पेंसिल मुझे दी। वह मुझ से सुखवंत ने ले ली और लौटाना भूल गया। छुट्टी होने पर डमर ने वह वापिस मांगी। डर कर मैं सुखवंत के घर वह लेने गया। कई बार मैं डमर को उसके घर तक छोड़ने जाता। रास्ते में एक बड़ा लड़का, मदन, जब-तब मुझे परेशान करता था। डमर के साथ उसके घर के सामने से गुज़रने पर इच्छा होती थी कि अब वह आकर कुछ कहे। एक बार सचमुच ही वह मिल गया और पंगा लेने लगा। पलक झपकते ही डमर ने उसे नीचे पटक दिया था। उसके बाद वह कुछ नहीं बोला। सालों बाद, मुझे लगता, डमर ज़रूर आर्मी में गया होगा। कई बार तो 26 जनवरी की परेड में 'गोरखा रेजिमेंट' के जवान देखकर मुझे उसकी याद आती!

Saturday, 28 January 2017

बड़े भैया


थापर कॉलेज, पटियाला और दिल्ली इंजीनियरिंग कॉलेज में भी बड़े भैया को दाखिला मिल रहा था। पिता जी अकेले कमाने वाले थे। नहीं पढ़ा पाए। रेलवे में नौकरी भी मिली तो 'यार्ड फोरमैन' की। अभी बीस साल के भी नहीं थे। सुनसान रेल लाइनों में घूमते रात में डर जाते थे। लोग भुतहा सिग्नल की कहानियां सुनाते रहते थे कि वो सिग्नल रात में अपने आप ऊपर हो जाता है और ट्रेन रुक जाती है। एक बार 'ऑन ड्यूटी' दिल्ली आए थे। साथ में ट्रेन को दिखाने की लालटेन भी लाए थे। हमें तो उस लालटेन से ही डर लगता था। जल्द ही उन्होंने वह नौकरी छोड़ दी। अन्य नौकरी के साथ-साथ आगे पढ़े और मुझे भी पढ़ाया।

मेहनत के फल

बड़े भैया और उनके दोस्त जहां जामुन और आम के पेड़ों पर चढ़ने में माहिर थे, वहीं हमारी टोली मूलियां उखाड़ कर भागने में। जिनका बाग़ और जिनका माल, पिकनिक भी उन्हीं के रहट वाले कुएं पर होती थी जहां से सारे बाग़ को सिंचाई का पानी मिलता। जल्द ही हमारी टोली ने शहतूत और माल्टे के छोटे पेड़ों पर भी धावा बोलना शुरू कर दिया। आखिर एक दिन माली की पकड़ में आ गए। सब बच्चों को सीधा कोठी में मालकिन के पास ले गया। सज़ा के तौर पर उन्होंने कहा: "तुम सब बच्चे माली के साथ रहट चलवाया करो और शहतूत तोड़ कर खा लिया करो।" अब 'मेहनत के फल' हमें और मीठे लगते! पटियाला में हमारे रेलवे क्वार्टर के पीछे इस विस्तृत बाग़ की ज़मीन की कीमत हमें आज भी इसलिए याद है कि तब सब कानों को हाथ लगाते हुए कहा करते थे: "हे भगवान! सात रूपए गज़!!"

Friday, 27 January 2017

पिता जी!

बहुत छोटा था। गर्मी के दिनों रेलवे प्लेटफार्म पर पिता जी के साथ घूम रहा था। प्यास लगी थी। पानी पिलाने वाला बाल्टी में लौटा डाल कर पानी पिला रहा था। छोटे-छोटे हाथों से 'ओक' ठीक न बनने पर पानी पिया कम जा रहा था, बिखर ज़्यादा रहा था। पानी पिलाने वाले ने मुझे डांटा। पिता जी ने उसे डांटा। अच्छा लगा था। अभी तक याद है!..

Demonetization!

बड़े भैया ने रेल की खिड़की से बाहर झांकते हुए कहा: "मेरी आंख में एक बड़ा-सा कोयला गिर गया है।" तुरंत हमने कहा: "चुप! घर जाकर अंगीठी सुलगाने के काम आएगा!" सन '68 में प्रकाशित यह पहला चुटकुला हमारा मितव्ययी दृष्टिकोण ज़ाहिर करता है। बस, ऐसे ही अब तक बिना बैंक गए काम चला रहे हैं। ..दे दिए मोदी जी को 50 दिन!

Thursday, 26 January 2017

मैं भी कर लूं..

"खुलेआम नकल चल रही थी। मैं भी कर लेता तो पास हो जाता!" ..बस, ऐसे ही समय गुज़र गया। कुछ ने फेल होने और नकल न करने पर शाबासी दी; कुछ ने सुनहरा अवसर हाथ से निकालने पर लताड़ा!.. पढ़े क्यों नहीं? इंटर का प्राइवेट फॉर्म भरा था। दो साल का नए विषयों का कोर्स और मात्र छः महीने का स्वयं तैयारी का समय। फिर बहती गंगा में हाथ क्यों नहीं धोए? ..बस, टीचर जी से 'अखियन याचना' करते रहते थे; वो 'खबरदार' का-सा संदेश देते। बजरंगी भाईजान की तरह परमिशन लेकर ही उस पार जाना चाहते थे!..

Tuesday, 24 January 2017

बस, तुम ही नहीं हो!

रेलवे का एक सबसे छोटा, पर सबसे अधिक याद आने वाला, हमारे लिए वह व्यक्ति है जो शाम ढले सिग्नलों में रखने की लालटेनें तैयार करता, एक-एक लालटेन लेकर सिग्नल की सीढ़ी पर चढ़ता, और सिग्नल के खोखे के भीतर एक-एक लालटेन रखता जिससे वे रात के अंधेरे में जगमगाते रहें.. चाहे कैसा भी आंधी-तूफान आए! बेशक, अब पुराने सिग्नलों की जगह बिजली के आधुनिक सिग्नलों ने ले ली है, तो भी पुराने सिग्नल कइयों की स्मृति में होंगे जो अधिकांश नीचे को होकर रेलगाड़ी को चलने का संकेत देते थे। 'सिग्नल डाउन' होते ही प्लेटफॉर्म पर खड़े यात्री अपने कम्पार्टमेंट की ओर लपकते थे। फिर गार्ड का सीटी बजाना, हरी झंडी दिखाना, इंजिन की 'कूक' और छोड़ने आए प्रियजनों का 'बाय' करते पीछे छूट जाना! गार्ड बाबू (बड़े भैया) ने बताया, कई जगह सिग्नल सीधी बाज़ू की आकृति में ट्रेन को रुकने (stop) का संकेत देते थे, और एकदम आकाश की ओर उठ कर चलने (move) का, तथा बीच की दशा (caution) धीरे-धीरे आगे बढ़ने का संकेत देती थी जिसे पीले रंग से दर्शाया जाता था। यानि उत्तर रेलवे में गाड़ियां जहां सिग्नल 'डाउन' होने पर चलती थीं, वहीं कुछ क्षत्रों में सिग्नल 'अप' होने पर! प्लेटफॉर्म पर स्कूल की तरह की घंटी बजाकर भी ट्रेन के शीघ्र ही आने-जाने की सूचना कई स्टेशन पर दी जाती थी।

                 सब वही है.. बस, तुम ही नहीं हो!

रेस

रेस जीतना सभी को पसंद है। खासकर बच्चों को तो यह बहुत पसंद है। प्रतिस्पर्धा मानो जीवन को गति दिए रहती है। बचपन में जोधपुर मेल से बड़े भाई के पास जाते हुए, जब ट्रेन छोटे-छोटे स्टेशनों पर नहीं रुकती थी, तो एक रोमांच का अनुभव होता था। रात में तो इन स्टेशनों पर हरी लालटेन दिखाता व्यक्ति मानो कहता: "जाओ, जाओ.. हमारा छोटा स्टेशन बड़ी रेलगाड़ियों के लिए नहीं है!" और ट्रेन झटपट उस अंधेरे में डूबे स्टेशन से दूर निकल जाती। हर स्टेशन से पहले और बाद के केबिन में भी लहरा रही हरी लालटेन आगे बढ़ने का संदेश दे रही होती। दिन में उन केबिन की दीवारों पर हम बड़ा-बड़ा लिखा देखते: "सावधानी हटी, दुर्घटना घटी"। बाल-मन इसकी अपने ढंग से व्याख्या कर उसमें उलझ जाता: "जब ट्रेन सावधानीपूर्वक हटी (यानि आगे बढ़ी) तो फिर दुर्घटना कैसे घट गई?" शायद इसीलिए सब कहते हैं: "क्यों बच्चों जैसी बातें कर रहे हो!"

मधुर स्मृति!

एक रोज़ घर में भाइयों के साथ बैठे बातें हो रही थीं। अचानक फोन की घंटी बज उठी। फोन उठाते ही हमारे मुंह से निकल गया: "नमस्कार, इंडियन एयरलाइन्स!" सब हंस कर बोले, "क्या बात, ओवरटाइम कर रहा है?"  फिर रात को एक बार गार्ड बाबू बड़े भैया को देखा.. घबराए-से टॉर्च जलाकर बेड के नीचे कुछ देख रहे थे। पूछा तो कहने लगे बेड से नीचे पांव रखते ही टॉर्च से देखने की आदत पड़ गई है। ट्रेनिंग में ही निर्देश दिए गए थे कि रात में बीच रास्ते में ही अगर कहीं ट्रेन रुक जाए तो नीचे ज़मीन पर पांव रखने से पहले टॉर्च से देख लें कि कहीं ट्रेन किसी पुल पर तो नहीं रुकी हुई!..

Monday, 23 January 2017

पहला आक्रोश!

बरसों रेलवे की 'सिंगल ट्रैक' ही रही। दूर-दराज क्षेत्रों में अब भी है। ऐसे में स्टेशन पर ही दो या अधिक लाइन होती हैं तथा दो विपरीत दिशाओं से आने वाली ट्रेन किसी मध्य स्टेशन पर ही क्रॉस करती हैं। यहां पिछले स्टेशन से पहुंची ट्रेन अपने प्लेटफॉर्म पर आकर रुकी रहती है जब तक दूसरी ओर की ट्रेन न आ जाए और आगे का ट्रैक खाली न हो जाए। ऐसे में कई बार तो पहले पहुंची ट्रेन को एकाध घंटा तक इंतज़ार करना पड़ता। गुस्सा तो तब आता, जब दूसरी ट्रेन जो आई देर से और चल पहले दी (ठेंगा दिखा कर)! यहां बाल-मन को शायद 'अन्याय' के विरुद्ध पहला आक्रोश आता कि पहले आई ट्रेन पहले क्यों नहीं गई? गार्ड बाबू, बड़े भैया ने तकनीकी कारण समझाया कि जिस ट्रेन को प्लेटफॉर्म पर रुकना होता है, उसे पहले ही आगे तक की लाइन-क्लियर देने की व्यवस्था की जाती है। यानि किसी स्थिति में यदि ट्रेन स्टेशन पर न रुक पाए, तो कम-से-कम वह बिना किसी दुर्घटना के आगे निकल जाए। इसी कारण बाद में आई ट्रेन को इसका लाभ मिल जाता है।

छोटे-छोटे हाथ

पटियाला के रेलवे माल-गोदाम से सटी सड़क पर जब दोपहर को एक आइसक्रीम वाला भाई साइकिल पर जाता था, तो दूर सामने हम अपने क्वार्टर की खिड़की से हाथ निकाल कर उसे बुलाते। कभी देख लेने पर वह आ भी जाता और छुरी से काट कर 'मलाई-बर्फ' एक पत्ते पर रख कर देता। कई बार लगता, वह हमारे छोटे-छोटे हाथ इतनी दूर से कैसे देख लेता है! धीरे-धीरे समझ आया कि बचपन में जो दूरी हमें 'बहुत दूर' लगती थी, वास्तव में वह उतनी थी नहीं। इसी तरह करनाल नहर जो हमें बचपन और सपनों में डराती रही.. कुछ समय पहले, उधर से गुजरने पर, उसका बहाव एकदम सामान्य लगा! (छोटा बच्चा जानके हमको न डराना रे!) उन छोटे-छोटे हाथों को समर्पित है यह पोस्ट!

पहली याद

पुरानी यादें उकेरना एक तरह से मन के भीतर झांकना भी है कि आखिर क्यों कोई पचास-साठ साल पुरानी बात याद रह जाती है और कोई दस साल पुरानी बात भी हम भूल जाते हैं। शायद कौतूहल और विलक्षणता सब से पहले एक बाल-मन को आकर्षित करती है। करनाल रेलवे स्टेशन पर काम करते पिता जी को 'ऑन ड्यूटी' लखनऊ जाना था। रेलगाड़ी की बजाय उनका अकेले जा रहे इंजन से जाना हमारे लिए विलक्षण था (शायद आगे दिल्ली से ट्रेन ली हो)। वापस लौटते हुए वह मेरे लिए एक ट्राइसिकल लाए थे। मैं तब तीन-चार साल का था। उन दिनों वहां 'फ्लाइंग एक्सप्रेस' का बिना रुके तेज़ गति से निकल जाना भी बच्चों के लिए कौतूहल भरा था। घर के सामने से ही कभी-कभी एक आर्मी ट्रक गुज़रता था। बच्चों के हाथ हिलाने पर वह स्नेहवश रुक जाए और सामने मोड़ तक घुमा लाए, यह तो बड़ी बात थी ही! एक और, जिसे मैं एक तीन साल के बच्चे के रूप में अपनी सबसे पहली स्मृति कहूंगा, बड़ी अजीब-सी है -- ट्राइसिकल से भी पहले की एक 'सवारी'! हमारे क्वार्टर के सामने ही रेलवे स्टेशन पर जाने की दो-तीन सीढियां थीं। वहीं दूसरी सीढ़ी पर हम यूं सवारी करते। एक-डेढ़ फुट का एक लकड़ी का तख्ता लेते। उसके नीचे एक साधारण तार रखते जो कुछ Z के आकार में मुड़ी होती थी। फट्टे पर बैठ कर एक हाथ से इसका बाहरी सिरा घुमाने पर हम चार-पांच बार में सीढ़ी की लंबाई पार करते। ..फोटो में स्टेशन का वह बाहरी भाग आज भी याद है। प्लेटफॉर्म भी जहां भाग कर 'टी-स्टाल' से मैं एक आने का एक 'केक' लाता था!..

Thursday, 19 January 2017

My Cutie!

No, no.. not that way.. I have my valid passport, visa & ticket!

Take Care!

Contributed to AIR-INDIANS

Aircraft carrying human cadaveric organs for transplant may now get top priority to take off and land on a priority basis to facilitate quick transportation of organs. It could be exempted from X-ray screening to avoid radiation exposure. Priority take off and landing alone can save more than 20-25 precious minutes, says a report (Times, Dec 12). Fixing norms, it also outlines the procedure in relation to the labelling, packaging and storage of organs, etc.

Lest we forget!


Safdarjung Airport was established as the Willingdon Airfield in 1929 and was India's second airport after Mumbai's Juhu Aerodrome. It was Delhi's only airport till 1962 when operations shifted to Palam Airport. People could go right up to the tarmac to receive and see off passengers at S'jung Airport. It's currently used only for VVIP choppers and small govt aircrafts. It also housed the Delhi Flying Club till January 2002. The high security S'jung Airport may be made partially open to public, with the Centre deciding to build an integrated headquarters for several aviation agencies next to its iconic central dome, including an exhibition hall on the ground floor, displaying art works from Air India's and AAI's collection, in the next three years.

December 5, 1954 picture showing departure of delegates to the World Forestry Congress for Srinagar from S'jung. Airport

Down memory lane..

Contributed to AIR-INDIANS

Down memory lane..

Members of the victorious World Cup Cricket team, who created history at Lords in 1983 by winning over the formidable West Indies team, were seen in a celebratory mood at IGI Airport, prior to boarding our flight AI-111 to London on June 24, 2008, to relive the memory of that stunning, nail-biting victory 25 years ago. They travelled on our brand new B777-300ER aircraft named 'Goa'. Air India had inducted five of these state-of- the-art, luxurious, 342-seater aircraft into its fleet by then, out of the 15 on order.

Seen cutting the cake in the picture are (from left) Mohinder Amarnath, Sandeep Patil, Madan Lal, Sunil Gavaskar, Kapil Dev, Yashpal Sharma and Kirti Azad. Mr. Jitender Bhargava, Executive Director-Corporate Communications, and Mr. DS Kohli, ED-Northern Region, were present to felicitate and see off the players.

Welcome aboard!

Feeling as in your own bed? Yeah.. the only difference is of 'little' height, as you are just above 35000 feet!.. Strolling down memory lane, got the picture from Air India's B777-300ER aircraft, an epitome of state-of-the-art, luxury, comfort and five-star ambience on board. Christened 'Jammu and Kashmir', the aircraft (VT-ALR) was showcased at the prestigious Farnborough International Airshow held in UK during July 14-20, 2008 and it earned rave reviews from visitors who got the opportunity to admire the aircraft's finer points. These aircrafts named after the various States of India, were deployed on the India-US route offering passengers a new era of unprecedented comfort.

विक्रम-बेताल

राजा विक्रमादित्य ने हार न मानी। हमेशा की तरह, वृक्ष से उतार कर शव को कंधे पर डाला और आगे बढ़ चले। इस पर शव में स्थित बेताल ने कहा: "राजन तुम्हारी थकान दूर करने को  फेसबुक की एक कहानी सुनाता हूं। अंत में मेरे प्रश्न का उत्तर यदि नहीं दे पाओगे तो तुम्हारा सर धड़ से अलग हो जाएगा। अतः ध्यान से सुनो: कलियुग में जब किसी को कोई काम नहीं होता तो वह फेसबुक के सहारे अपने दिन काटता है। अपनी किसी पोस्ट को एक 'लाइक' मिलने पर वह स्वयं को श्रेष्ठ, दो 'लाइक' पर परम श्रेष्ठ, और तीन पर तो सर्वश्रेष्ठ मानकर लोटपोट ही हो जाता है। यहां मैं जिस प्राणी की बात कर रहा हूं उसकी 'लोटपोट' व हमारे 'चंदा मामा' के समय से कुछ रचनाएं छपती रही हैं। लेकिन अभी कुछ दिन पहले उसने फेसबुक पर एक ऐसी तस्वीर 'तारे ज़मीं पर' पोस्ट कर दी कि चार 'लाइक' मिल गए और बवाल मच गया। नीचे वह तस्वीर देखो और बताओ कि आखिर यह प्राणी तारों को ज़मीन पर कैसे ले आया?" तब राजा ने यूं उत्तर दिया: "हे बेताल! इस कलियुग में जब महिलाएं शॉपिंग करती हैं तो पुरुष मॉल में इधर-उधर उनके बैग थामे बैठे रहते है या बच्चों को संभाले रहते हैं। ऐसे ही खाली समय में इस प्राणी ने शोरूम की लाइटों का अक्स फर्श पर देखा और फोटो खींच कर 'तारे ज़मीं पर' नाम दे कर पोस्ट कर दिया।" राजा के जवाब से संतुष्ट होकर बेताल हंसा और उड़ कर फिर पेड़ पर जा बैठा।

              ******तारे ******ज़मीं ******पर*****

Malabar Princess!

Lest we forget our "Malabar Princess"!

Few details of Air India's maiden international flight:
Date: June 8, 1948
Departure time: 00:05
Aircraft: VT-CQP, 40-seater, Lockheed Constellation
Departure from: Bombay's Santa Cruz airport
For: London Via Cairo-Geneva
Capt. KR Guzder (Bombay-Cairo) & Capt. DK Jatar (Cairo-Geneva-London)
Passengers on board: 35
Fare: Rs.1720 (Bombay-London)
Picture (1) shows Mr VK Krishna Menon, then High Commissioner for India in the UK, greeting JRD Tata and his wife, Ms Thelma Tata on arrival of the inaugural flight at London airport, (2) Capt. KR Guzder being interviewed by Hamid Sayani of All India Radio, and (3) Capt. DK Jatar.

भागम-भाग

--"क्यों सब भाग रहे हो?"
--"आगे निकलने के लिए.. किसी को पीछे छोड़ने के लिए.. किसी को ढूंढने के लिए.. किसी को अड़ंगी मार गिराने के लिए..!" ढूंढने वाला भी उतनी तेज़ दौड़ रहा है.. जो खो गया, पीछे छूट गया, वह भी उसी गति से दौड़ रहा है! अरे, कोई तो रुको.. यूं भागते तो उतना ही फासला बना रहेगा। इसी तरह हम सब भाग रहे हैं - बेखबर, कि जिसमें दौड़ रहे हैं, वह एक घेरा है - सब उसी घेरे की ही परिक्रमा करते अपने-अपने ढंग से स्वयं को दौड़ में विजेता मान रहे हैं! इस अंधाधुंध दौड़ से बाहर हो, हम उलटा क्या चले -- सब बिछुड़े मिल गए! यहां भी जो हमारे लिए नहीं रुका, वह कभी हमारा था ही नहीं!..

जो न दे उसका भी भला!

..तो एग्ज़ाम में पास होने के हम सब बचपन में अनेक टोटके आज़माते थे। तोते का झूठा फल खाने से लेकर नीलकंठ पक्षी से दुआ मांगने तक - 'नीलकंठ तुम नीले रहो, तुम्हारे पंख सुनहरी रहें, रामजी से कहकर, बस, इस बार पास करा देना!' आखिर कब तक ऐसे चलता। कई बार तो मन करता कि सबसे पहले ही 'उत्तर (न लिखी) पुस्तिका' मास्टरजी को पकड़ा दें.. शायद सफाई के ही 5-10 अंक मिल जाएं। अब, भई, आपसे यह पूछना तो उचित नहीं कि क्या कभी आपके साथ भी ऐसा हुआ है कि एक भी सवाल न आता हो? हम तो ऐसे में मास्टर जी के पास से गुज़रते ऐसा गंभीर मुंह बनाते थे जैसेकि सारे ही सवाल आते हैं, पहले कौनसा करें! कोई अन्य छात्र दाएं-बाएं से देखता था तो हम हर बार गंभीर मुद्रा में प्रश्न-पत्र ही पढ़ कर टाइम पास कर रहे होते थे! ऊपर ही क्या-क्या 'वार्निंग' लिखी होती थीं: "अंदर कहीं भी अपना नाम, रोल नंबर न लिखें। कोई चिह्न आदि न बनाएं"। हमने तो एक बार यहां भी भगवान का नाम लेकर पहले पेज पर एक प्रशंसा-पंक्ति लिख दी थी: "यह देश है दानवीरों का!" और अंतिम पृष्ठ पर एक याचना-पंक्ति: "जो न दे उसका भी भला!" भला, किसका दिल नहीं पसीजेगा ऐसे में! "बेचारे बच्चे ने कितनी मेहनत की होगी डर-डर कर यह लिखने में..जा, बेटा, जा तू अगली क्लास में!!"

Tuesday, 17 January 2017

मधुर-स्मृति

कहते हैं आप हीरे को नहीं चुनते, हीरा आपको चुनता है। मेरठ सिटी रेलवे स्टेशन के बुक स्टाल से, पहले कभी न सुनी, एक बाल-पत्रिका 'मिलिन्द' ने शायद ऐसे ही मुझे बुलाया और मैं 75 पैसे में उसे खरीद कर घर ले आया। तब मैं 14-15 साल का था। मेरी उसमें काफी छोटी-मोटी रचनाएं छपीं। मैं उसमें बहुत पत्र लिखता था। संपादक श्री रत्न प्रकाश 'शील' बहुत प्यार से जवाब देते थे: "प्रिय विजय बाबू, 'मिलिन्द' के प्रति आपका इतना प्यार देखकर आपके प्रति एक स्नेह-सा उमड़ता है..!" 1968-69 के उनके कुछ पत्र मेरे पास अब भी हैं। तब हम दिल्ली शाहदरा में रहते थे। एक रोज़ संपादकीय विभाग के गोपाल गुप्ता जी हमारे घर आ गए। पता नहीं क्यों मैं इस बात से डरता था कि यदि उन्हें यह मालूम हो गया कि मैं तो बहुत छोटा हूं तो कहीं वे मेरी रचनाएं छापना बंद न कर दें। अतः मैंने गोपाल जी को अपना परिचय 'विजय जी' के छोटे भाई के रूप में दिया और "विजय जी तो ऑफिस गए हैं..आज शनिवार 'हाफ-डे' है तो एक-डेढ़ बजे आ जाएंगे।" वह तो तब तक रुकने को ही तैयार हो गए। दो बजे मैंने कहा: "वह शायद लौटते हुए टाइप सीखने की क्लास में चले गए होंगे।" वह खुशी-खुशी बोले: "चलो, वहीं चल लेते हैं।" --"ओह! वह तो यहां भी नहीं हैं.." एक दुकान में देखकर मैंने कहा। 'मिलिन्द और विजय जी' की बहुत-सी बातें करते मैं उन्हें चांदनी-चौक तक छोड़ने आया तो उन्होंने जुबली सिनेमा के 'मैटिनी-शो' की दो टिकटें ले लीं। 'राज़' पिक्चर लगी थी जो शायद 'एडल्ट मूवी' थी। मुझे उसमे नहीं जाने दिया गया था। उन्हें वह टिकटें वापस करनी पड़ीं। वह तब वहां से 'मिलिन्द' के कार्यालय दरियागंज चले गए और मैं घर लौट आया। कई साल बाद मेरी "शील" जी से फोन पर बात हुई। वह तब 'नंदन' के उप-संपादक थे। मुझे तब इंडियन एयरलाइन्स में श्रीनगर ड्यूटी ज्वाइन करनी थी। बहुत चाह कर भी मैं उनसे मिल नहीं पाया जो कभी अक्सर बुलाते थे!..

तुम क्या जानो एक टुकड़े स्पंज की कीमत!

बचपन में मैं पढाई में अव्वल था। इसका श्रेय दीदी को है। उन्होंने मुझे इस योग्य बनाया कि पहली क्लास में होते हुए मुझे हेड-मिस्ट्रेस ने दूसरी क्लास के एग्ज़ाम में बैठाया और मैं सीधा तीसरी क्लास में आ गया। यहां मेरा सामना एक लड़की कमलेश से हुआ। हम दोनों में यही प्रतिस्पर्धा रहती की डिवीज़न के सवाल कौन पहले करके दिखाएगा। ज़्यादातर कमलेश के ही फर्स्ट आने पर मैं इस निष्कर्ष पर पहुंचा कि वह जीभ से ही अपनी स्लेट पौंछ कर फटाफट अगला सवाल शुरू कर देती थी जबकि मैं हाथ से रगड़ कर स्लेट साफ करता रह जाता था। तब मेरी बहुत इच्छा होती थी कि कहीं से छोटा-सा स्पंज मिल जाए जो एक-दो बच्चों के ही पास होता था। जल्दी ही दीदी ने इसका विकल्प ढूंढा और एक छोटे-से कपडे में ज़रा-सी रुई भर कर एक नन्ही-गद्दी बनाकर मुझे दी जिसको मैं हल्का-सा पानी में भिगो लेता था। अब भी जब कहीं स्पंज मुझे मिलता है, मैं उसे संभाल कर रख लेता हूं। प्लीज़, कोई बुरा न माने, बचपन से ही मुझे वो बच्चे अच्छे नहीं लगते जो जीभ से स्लेट साफ करते हैं या क्लास में जिनकी नाक बहती रहती है!..

Monday, 16 January 2017

डरना मना है

पांच-सात साल निकल जाते हैं इस यकीन में कि भूत-प्रेत नहीं होते; सब मन का वहम है; विज्ञान के इस युग में ऐसी बातों पर विश्वास नहीं करना चाहिए.. फिर बड़े भैया की सुनाई वो बातें याद आ जाती हैं जब हम डर के मारे सब जगह अम्मा को ही साथ लेकर जाते थे! और भैया तो खुद साइंस टीचर की नौकरी करने '65-66 में दिल्ली से फाज़िल्का (मध्य प्रदेश) गए थे। बस, एक रात अपने कमरे में खिड़की के पास बैठे पढ़ रहे थे। अचानक गर्दन पर खुजली-सी हुई जो बढ़ती गई "..और फिर मैं उछलने लगा!" बाहर खड़ी मालिन दिखाई दी, बोली: "तुम्हारे दोस्त शरारत कर रहे हैं!" सुबह पूछने पर उसने कहा, "मैं तो आपकी खिड़की की ओर से आई-गई ही नहीं।" ऐसा फिर दो-तीन बार हुआ तो उन्होंने कुछ लोगों से बात की। स्कूल के ही संस्कृत टीचर रतिराम कुछ तंत्र-विद्या जानते थे। फिर, एक मध्य-रात्रि भैया अपने दो-तीन दोस्तों के साथ वहां खड़े थे जहां का नाम न लेना ही ठीक है। रतिराम जी ने उनके इर्द-गिर्द एक रेखा खींच कर कहा कि किसी भी हालत में इस घेरे से बाहर न आएं। उनके कुछ मंत्रोच्चारण पर "..हमें सामने दीवार पर एक दिया जलता नज़र आया जो धीरे-धीरे अग्निपुंज-सा होकर हमारे घेरे की ओर बढ़ता आया!" फिर, रतिराम जी ने मंत्र पढ़ कर उसकी ओर कुछ पानी छिड़क कर कहा "भस्म हो जा" तो सब शांत हो गया। पता चला, कुछ दिन पहले भैया ने छात्रों को कहकर एक रास्ता कंटीली तारों से बंद करा दिया था। रतिराम जी के कहने पर वह उन्होंने पुनः खुलवा दिया।

भूली-बिसरी यादें

रविवार, 7 जून, 1964 को हम कुछ बच्चे भागे-भागे रेलवे स्टेशन की ओर गए। 27 मई को चाचा नेहरू का स्वर्गवास हुआ था। 8 जून को प्रातः उनका अस्थि-विसर्जन संगम में होना था। दिल्ली से इलाहबाद के लिए एक विशेष ट्रेन को जाना था। बड़ी-बड़ी शीशे की खिड़कियों से सुसज्जित एकदम सफेद रंग के एक विशेष कम्पार्टमेंट में अस्थि-कलश को परिवार के सदस्य तथा अन्य गण्य-मान्य व्यक्ति लेकर जा रहे थे। उस सफेद कम्पार्टमेंट की कुछ ऐसी छवि मन में है; यद्यपि संबंधित फोटो हमें किसी कलेक्शन में नहीं मिल पाई। जहां से भी वह ट्रेन गुज़रती, लोग उत्सुकता से देखते और अपनी भावभीनी विदाई देते!

भूली-बिसरी यादें


..तो एक दस साल का बच्चा अपने देश के प्रधान मंत्री के बारे में जानने की इच्छा रखता है। 11 जनवरी, 1966 को जब हम पिताजी के पास मेरठ जा रहे थे, हमारे मन में भी रेडियो पर लाल बहादुर शास्त्री जी के आकस्मिक निधन की न्यूज़ सुनने की इच्छा थी। सन '60 पटियाला में 300 का लिया 'झंकार' रेडियो, तब पिताजी के पास था। वैसे तो बड़ी दीदी भी आ गयीं थीं। उनके पास एक ट्रांजिस्टर भी था। पर किसे मालूम था कि मेरठ में हम न रेडियो सुन पाएंगे, न ट्रांजिस्टर। बस, ट्रेन में तो ऐसे ही दो घंटे का सफर कट गया। एक छोटा-सा डॉगी साथ ले जा रहे थे। एक बार जब टीटी डिब्बे में चढ़ा तो हमने डर कर उसे सीट के नीचे छोड़ दिया और फिर उसे ढूंढने में समय गुज़र गया। पिताजी रेलवे में थे। प्लेटफॉर्म पर ही मिल गए -- एक दुःखद समाचार के साथ -- रेडियो चोरी हो गया था। सबने सोचा, प्लेटफॉर्म पर ही कुछ चाय-वाय पी कर चलते हैं। टी-स्टाल पर ही एक व्यक्ति काउंटर पर रखे जार से एक केक निकालता और खा जाता। उसे देखकर सब हंसते। इसी दौरान काउंटर पर रखा दीदी का ट्रांजिस्टर भी गायब हो गया जिसका पता हमें तब लगा जब प्लेटफॉर्म के अंतिम छोर पर आ गए थे। फटाफट बड़े भैया और पिताजी टी-स्टाल पर गए। तब तक वहां कोई नहीं था। पिताजी के साथ रेलवे कोतवाली का एक सिपाही गया और उसने सब रिक्शावालों से पूछताछ की। एक ने बताया कि वह अमुक हुलिये वाले यात्री को घंटा-घर छोड़ कर आया है। फौरन ही वह उन्हें उसी जगह ले गया। वह व्यक्ति एक दुकान के बाहर खड़ा कोई ड्रिंक ले रहा था। कांस्टेबल ने उसके कंधे पर लटका ट्रांजिस्टर अपने कब्जे में ले लिया और उसे पकड़ कर स्टेशन ले आए। पास ही हमारा क्वार्टर था। अगली सुबह हम चुपचाप उसे देखने आए। वह हवालात में बंद था।

भाभी जी

पंजाब में चार जमात पंजाबी क्या पढ़ी, दिल्ली आते ही सामने वाली भाभी जी ने जॉब भी लगा दी। (नहीं, नहीं, यह अंगूरी भाभी जैसी बात नहीं।) मैं तो तब दस साल का था। अपना दूध लेने जाता तो वह भी अपना लौटा पकड़ा देतीं। "भाभी" शब्द पहली बार मैंने दूध वाले से ही सुना: "आ गया भाभी का नौकर!" सुन कर बड़ा अजीब लगता। जब तब वह कह देतीं: "मेरी एक चिट्ठी लिख देगा?" पोस्ट कार्ड तब 5 पैसे का था। बेचारे का कचूमर ही निकल जाता। ज़रा-सी खाली जगह देखते ही वह कहतीं - यहां इसको प्यार, उसको पैरी पैंना.. लिख दे। एक बार तो हद हो गई जब उन्होंने पते वाली जगह पर कार्ड उलटा करके एक लाइन लिखने को कहा। मैंने कहा: "देखना, आप पर फाइन लग जाएगा। ऐसे 10 पैसे वाला लिफाफा कौन खरीदेगा?" संयोगवश जल्दी ही पोस्ट कार्ड का दाम बढ़ गया जिसकी ज़िम्मेदार वह खुद को मानती रहीं। इन 40 सालों में मैं भी पंजाबी लिखना भूल गया। पढ़ लेता हूं।