Monday, 16 January 2017

डरना मना है

पांच-सात साल निकल जाते हैं इस यकीन में कि भूत-प्रेत नहीं होते; सब मन का वहम है; विज्ञान के इस युग में ऐसी बातों पर विश्वास नहीं करना चाहिए.. फिर बड़े भैया की सुनाई वो बातें याद आ जाती हैं जब हम डर के मारे सब जगह अम्मा को ही साथ लेकर जाते थे! और भैया तो खुद साइंस टीचर की नौकरी करने '65-66 में दिल्ली से फाज़िल्का (मध्य प्रदेश) गए थे। बस, एक रात अपने कमरे में खिड़की के पास बैठे पढ़ रहे थे। अचानक गर्दन पर खुजली-सी हुई जो बढ़ती गई "..और फिर मैं उछलने लगा!" बाहर खड़ी मालिन दिखाई दी, बोली: "तुम्हारे दोस्त शरारत कर रहे हैं!" सुबह पूछने पर उसने कहा, "मैं तो आपकी खिड़की की ओर से आई-गई ही नहीं।" ऐसा फिर दो-तीन बार हुआ तो उन्होंने कुछ लोगों से बात की। स्कूल के ही संस्कृत टीचर रतिराम कुछ तंत्र-विद्या जानते थे। फिर, एक मध्य-रात्रि भैया अपने दो-तीन दोस्तों के साथ वहां खड़े थे जहां का नाम न लेना ही ठीक है। रतिराम जी ने उनके इर्द-गिर्द एक रेखा खींच कर कहा कि किसी भी हालत में इस घेरे से बाहर न आएं। उनके कुछ मंत्रोच्चारण पर "..हमें सामने दीवार पर एक दिया जलता नज़र आया जो धीरे-धीरे अग्निपुंज-सा होकर हमारे घेरे की ओर बढ़ता आया!" फिर, रतिराम जी ने मंत्र पढ़ कर उसकी ओर कुछ पानी छिड़क कर कहा "भस्म हो जा" तो सब शांत हो गया। पता चला, कुछ दिन पहले भैया ने छात्रों को कहकर एक रास्ता कंटीली तारों से बंद करा दिया था। रतिराम जी के कहने पर वह उन्होंने पुनः खुलवा दिया।

No comments:

Post a Comment