साथ के दशक में दीदी को कॉलेज में 'पार्कर' का एक पेन किसी प्राइज़ में मिला था। उसकी निब के बारे में ही सब "सौ रूपए की है!" कहकर बेहोश होते-होते बचते थे! मैं तब इंग्लिश मीडियम प्राइमरी स्कूल में था। वह रेकॉगनाइज़ न होने के कारण, मेरा दिल्ली आने पर बकायदा एक 'एलिजिबिल्टी' टेस्ट लेकर ही छठी क्लास में दाखिला हुआ था। कॉरपोरेशन के उस स्कूल में हम टाट पर बैठते और 'जी की निब' लगे होल्डर को स्याही की दवात में डुबो कर चार लाइन की कॉपी पर (पुनः) 'ए, बी, सी..' लिखते। (यहां सरकारी स्कूलों में तब छठी से इंग्लिश आरम्भ होती थी।) फिर क्या -- टॉप तो कर गए, पर मास्टर जी की धमकियां हम तक पहुंचने लगीं कि अगली बार वह मुझे फेल करेंगे। कारण? रिज़ल्ट आने के बाद अन्य सब बच्चे उनके घर मिठाई दे आए थे!.. ऐसे ही एक दिन आधी-छुट्टी में मायूस घूमते हनुमान मंदिर को बाहर से ही 'जय' कर चलने लगे तो पांव के नीचे से एक पुराना-सा रुमाल उठाया। उसमें एक-एक के तीन नोट थे। एक रूपए की मिठाई लेकर अगले दिन मास्टर जी के घर गए। खुशी-खुशी उन्होंने वह मिठाई अपने कनस्तर में उंडेल दी! तब से आजतक हम हनुमान जी की पूजा करते आ रहे हैं!
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