..तो एक दस साल का बच्चा अपने देश के प्रधान मंत्री के बारे में जानने की इच्छा रखता है। 11 जनवरी, 1966 को जब हम पिताजी के पास मेरठ जा रहे थे, हमारे मन में भी रेडियो पर लाल बहादुर शास्त्री जी के आकस्मिक निधन की न्यूज़ सुनने की इच्छा थी। सन '60 पटियाला में 300 का लिया 'झंकार' रेडियो, तब पिताजी के पास था। वैसे तो बड़ी दीदी भी आ गयीं थीं। उनके पास एक ट्रांजिस्टर भी था। पर किसे मालूम था कि मेरठ में हम न रेडियो सुन पाएंगे, न ट्रांजिस्टर। बस, ट्रेन में तो ऐसे ही दो घंटे का सफर कट गया। एक छोटा-सा डॉगी साथ ले जा रहे थे। एक बार जब टीटी डिब्बे में चढ़ा तो हमने डर कर उसे सीट के नीचे छोड़ दिया और फिर उसे ढूंढने में समय गुज़र गया। पिताजी रेलवे में थे। प्लेटफॉर्म पर ही मिल गए -- एक दुःखद समाचार के साथ -- रेडियो चोरी हो गया था। सबने सोचा, प्लेटफॉर्म पर ही कुछ चाय-वाय पी कर चलते हैं। टी-स्टाल पर ही एक व्यक्ति काउंटर पर रखे जार से एक केक निकालता और खा जाता। उसे देखकर सब हंसते। इसी दौरान काउंटर पर रखा दीदी का ट्रांजिस्टर भी गायब हो गया जिसका पता हमें तब लगा जब प्लेटफॉर्म के अंतिम छोर पर आ गए थे। फटाफट बड़े भैया और पिताजी टी-स्टाल पर गए। तब तक वहां कोई नहीं था। पिताजी के साथ रेलवे कोतवाली का एक सिपाही गया और उसने सब रिक्शावालों से पूछताछ की। एक ने बताया कि वह अमुक हुलिये वाले यात्री को घंटा-घर छोड़ कर आया है। फौरन ही वह उन्हें उसी जगह ले गया। वह व्यक्ति एक दुकान के बाहर खड़ा कोई ड्रिंक ले रहा था। कांस्टेबल ने उसके कंधे पर लटका ट्रांजिस्टर अपने कब्जे में ले लिया और उसे पकड़ कर स्टेशन ले आए। पास ही हमारा क्वार्टर था। अगली सुबह हम चुपचाप उसे देखने आए। वह हवालात में बंद था।
Monday, 16 January 2017
भूली-बिसरी यादें
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