Monday, 16 January 2017

कहानी की कहानी

कहानी की कहानी!

छोटी-मोटी रचनाएं तो हमने काफी लिखीं। कहानी एक ही लिखी ('टूटना') सन 1970 में। उसकी एक प्रति कहीं मिली तो दिल किया टाइप कर रख लें। एकाध जगह पढ़ कर शरम-सी आई तो सोच में पड़ गए कि अब क्या करें। मौलिकता भी नहीं बिगाड़ना चाहते थे। दिन-रात इसी उधेड़बुन में रहते। आखिरकार, एक मध्यरात्रि सेंसरबोर्ड को ही फोन कर दो टूक अपनी समस्या बता दी, "भैया, आप लोग तो एक्सपर्ट हैं, क्या करें -- बारिश में भीगने वाला सीन हटा दें?"  उधर से आवाज़ आई, "इनकी सुनो, यह अभी तक सन '70 के बारिश वाले सीन से ही शरमा रहे हैं!" तभी हड़बड़ा कर हमारी आंख खुल गई। लेकिन हमारी शंका का तो समाधान हो ही गया था। इन दिनों दिल्ली में चल रहे विश्व पुस्तक मेले में कुछ दोस्तों को वह कहानी दिखाने पहुंचे तो सबने उसे एक बेहतरीन मनोवैज्ञानिक कहानी बताया जो 'वर्ल्ड बुक फेयर' में भी 'एंट्री' पा चुकी थी। अरे, भई, कहानी हमारे साथ बुक फेयर में ही तो थी!

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