बचपन में मैं पढाई में अव्वल था। इसका श्रेय दीदी को है। उन्होंने मुझे इस योग्य बनाया कि पहली क्लास में होते हुए मुझे हेड-मिस्ट्रेस ने दूसरी क्लास के एग्ज़ाम में बैठाया और मैं सीधा तीसरी क्लास में आ गया। यहां मेरा सामना एक लड़की कमलेश से हुआ। हम दोनों में यही प्रतिस्पर्धा रहती की डिवीज़न के सवाल कौन पहले करके दिखाएगा। ज़्यादातर कमलेश के ही फर्स्ट आने पर मैं इस निष्कर्ष पर पहुंचा कि वह जीभ से ही अपनी स्लेट पौंछ कर फटाफट अगला सवाल शुरू कर देती थी जबकि मैं हाथ से रगड़ कर स्लेट साफ करता रह जाता था। तब मेरी बहुत इच्छा होती थी कि कहीं से छोटा-सा स्पंज मिल जाए जो एक-दो बच्चों के ही पास होता था। जल्दी ही दीदी ने इसका विकल्प ढूंढा और एक छोटे-से कपडे में ज़रा-सी रुई भर कर एक नन्ही-गद्दी बनाकर मुझे दी जिसको मैं हल्का-सा पानी में भिगो लेता था। अब भी जब कहीं स्पंज मुझे मिलता है, मैं उसे संभाल कर रख लेता हूं। प्लीज़, कोई बुरा न माने, बचपन से ही मुझे वो बच्चे अच्छे नहीं लगते जो जीभ से स्लेट साफ करते हैं या क्लास में जिनकी नाक बहती रहती है!..
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