बड़े भैया और उनके दोस्त जहां जामुन और आम के पेड़ों पर चढ़ने में माहिर थे, वहीं हमारी टोली मूलियां उखाड़ कर भागने में। जिनका बाग़ और जिनका माल, पिकनिक भी उन्हीं के रहट वाले कुएं पर होती थी जहां से सारे बाग़ को सिंचाई का पानी मिलता। जल्द ही हमारी टोली ने शहतूत और माल्टे के छोटे पेड़ों पर भी धावा बोलना शुरू कर दिया। आखिर एक दिन माली की पकड़ में आ गए। सब बच्चों को सीधा कोठी में मालकिन के पास ले गया। सज़ा के तौर पर उन्होंने कहा: "तुम सब बच्चे माली के साथ रहट चलवाया करो और शहतूत तोड़ कर खा लिया करो।" अब 'मेहनत के फल' हमें और मीठे लगते! पटियाला में हमारे रेलवे क्वार्टर के पीछे इस विस्तृत बाग़ की ज़मीन की कीमत हमें आज भी इसलिए याद है कि तब सब कानों को हाथ लगाते हुए कहा करते थे: "हे भगवान! सात रूपए गज़!!"
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