Tuesday, 24 January 2017

बस, तुम ही नहीं हो!

रेलवे का एक सबसे छोटा, पर सबसे अधिक याद आने वाला, हमारे लिए वह व्यक्ति है जो शाम ढले सिग्नलों में रखने की लालटेनें तैयार करता, एक-एक लालटेन लेकर सिग्नल की सीढ़ी पर चढ़ता, और सिग्नल के खोखे के भीतर एक-एक लालटेन रखता जिससे वे रात के अंधेरे में जगमगाते रहें.. चाहे कैसा भी आंधी-तूफान आए! बेशक, अब पुराने सिग्नलों की जगह बिजली के आधुनिक सिग्नलों ने ले ली है, तो भी पुराने सिग्नल कइयों की स्मृति में होंगे जो अधिकांश नीचे को होकर रेलगाड़ी को चलने का संकेत देते थे। 'सिग्नल डाउन' होते ही प्लेटफॉर्म पर खड़े यात्री अपने कम्पार्टमेंट की ओर लपकते थे। फिर गार्ड का सीटी बजाना, हरी झंडी दिखाना, इंजिन की 'कूक' और छोड़ने आए प्रियजनों का 'बाय' करते पीछे छूट जाना! गार्ड बाबू (बड़े भैया) ने बताया, कई जगह सिग्नल सीधी बाज़ू की आकृति में ट्रेन को रुकने (stop) का संकेत देते थे, और एकदम आकाश की ओर उठ कर चलने (move) का, तथा बीच की दशा (caution) धीरे-धीरे आगे बढ़ने का संकेत देती थी जिसे पीले रंग से दर्शाया जाता था। यानि उत्तर रेलवे में गाड़ियां जहां सिग्नल 'डाउन' होने पर चलती थीं, वहीं कुछ क्षत्रों में सिग्नल 'अप' होने पर! प्लेटफॉर्म पर स्कूल की तरह की घंटी बजाकर भी ट्रेन के शीघ्र ही आने-जाने की सूचना कई स्टेशन पर दी जाती थी।

                 सब वही है.. बस, तुम ही नहीं हो!

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