Saturday, 14 January 2017

मधुर स्मृति

मधुर स्मृति: उन दिनों पटियाला में दीदी को एम.ए. करते हुए सौ रूपये प्रति माह स्कॉलरशिप मिलता था। उस दिन वह मुझे एक रुपया देतीं। और मैं सुबह नाश्ते के लिए मक्खन की टिक्कियां लेने भागता। तीन आने की एक टिक्की आती, पर कैंटीन वाला मुझे 1 रुपये में 6 टिक्की देता!(1रुपया=16आने, 1आना=4पैसे)। लोहिड़ी के दिनों में "सुंदर-मुंदरिये" सुनाने पर घरों के लोग हम बच्चों की टोली को 1-1 पैसा ही देते थे। एक घर वाले कहते: कल आना, एक रुपया देंगे। रात भर नींद नहीं आती थी। (झूठे कहीं के!) फिर भी, उनका ऐसा कहना, आजतक मन को स्फुरित करता है - लगता है, अपना वो "पेंडिंग" एक रुपया ले  आऊं! कैंटीन वाले का भी शुक्रिया करना है। काली माता के मंदिर के भी दर्शन करने हैं जिनसे डर कर मैं अम्माजी की ओट में छुप जाता था। और दुखःनिवारण साहिब गुरूद्वारे के पवित्र सरोवर में जंजीर पकड़ कर नहाते, एक 8-9 साल के बच्चे की तो मुझे हमेशा ही याद आती है। दीदी की ग्रुप फ़ोटो के ऊपर लिखी इस पंक्ति का अर्थ कभी उनसे पूछ ही नहीं पाया: चिर विरह मिलन पुलिनों की सरिता है यह जीवन!..

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