Tuesday, 17 January 2017

मधुर-स्मृति

कहते हैं आप हीरे को नहीं चुनते, हीरा आपको चुनता है। मेरठ सिटी रेलवे स्टेशन के बुक स्टाल से, पहले कभी न सुनी, एक बाल-पत्रिका 'मिलिन्द' ने शायद ऐसे ही मुझे बुलाया और मैं 75 पैसे में उसे खरीद कर घर ले आया। तब मैं 14-15 साल का था। मेरी उसमें काफी छोटी-मोटी रचनाएं छपीं। मैं उसमें बहुत पत्र लिखता था। संपादक श्री रत्न प्रकाश 'शील' बहुत प्यार से जवाब देते थे: "प्रिय विजय बाबू, 'मिलिन्द' के प्रति आपका इतना प्यार देखकर आपके प्रति एक स्नेह-सा उमड़ता है..!" 1968-69 के उनके कुछ पत्र मेरे पास अब भी हैं। तब हम दिल्ली शाहदरा में रहते थे। एक रोज़ संपादकीय विभाग के गोपाल गुप्ता जी हमारे घर आ गए। पता नहीं क्यों मैं इस बात से डरता था कि यदि उन्हें यह मालूम हो गया कि मैं तो बहुत छोटा हूं तो कहीं वे मेरी रचनाएं छापना बंद न कर दें। अतः मैंने गोपाल जी को अपना परिचय 'विजय जी' के छोटे भाई के रूप में दिया और "विजय जी तो ऑफिस गए हैं..आज शनिवार 'हाफ-डे' है तो एक-डेढ़ बजे आ जाएंगे।" वह तो तब तक रुकने को ही तैयार हो गए। दो बजे मैंने कहा: "वह शायद लौटते हुए टाइप सीखने की क्लास में चले गए होंगे।" वह खुशी-खुशी बोले: "चलो, वहीं चल लेते हैं।" --"ओह! वह तो यहां भी नहीं हैं.." एक दुकान में देखकर मैंने कहा। 'मिलिन्द और विजय जी' की बहुत-सी बातें करते मैं उन्हें चांदनी-चौक तक छोड़ने आया तो उन्होंने जुबली सिनेमा के 'मैटिनी-शो' की दो टिकटें ले लीं। 'राज़' पिक्चर लगी थी जो शायद 'एडल्ट मूवी' थी। मुझे उसमे नहीं जाने दिया गया था। उन्हें वह टिकटें वापस करनी पड़ीं। वह तब वहां से 'मिलिन्द' के कार्यालय दरियागंज चले गए और मैं घर लौट आया। कई साल बाद मेरी "शील" जी से फोन पर बात हुई। वह तब 'नंदन' के उप-संपादक थे। मुझे तब इंडियन एयरलाइन्स में श्रीनगर ड्यूटी ज्वाइन करनी थी। बहुत चाह कर भी मैं उनसे मिल नहीं पाया जो कभी अक्सर बुलाते थे!..

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