आठवीं क्लास में एक कहानी पढ़ी थी ('A Boy of Fourteen') जिसमें एक चौदह साल के लड़के की मनः स्थिति का वर्णन था कि किस तरह वह न अपने को बच्चों में पाता है, न बड़ों में; और सही तालमेल न मिलने के कारण किस तरह उसके व्यवहार में एक विद्रोह-सा झलकता है। कुछ ऐसा ही मैं इस अवस्था में पिताजी के साथ रहने लगा था। रिटायरमेंट के बाद वह सबसे बड़े भाई के पास बाड़मेर रुक गए थे। हम सभी वहां गर्मी की छुटियों में गए थे। चारों ओर रेत ही रेत। दिल्ली से जोधपुर होते हुए ट्रेन में उन दिनों तीस घंटे का सफर। पिताजी को वहां छोड़ कर हम सब सुबह 4 बजे की ट्रेन से वापस चलने लगे तो मन किया कि उनके पांव छू कर माफ़ी मांग लूं। पर ऐसा नहीं कर पाया। घर आकर अपने पचास रूपए के 'क्लिक' कैमरे से खींची उनकी एक फोटो बड़ी करा कर उसे मैंने फ्रेम कराया और सामने ही दीवार पर लगा दी कि, आने पर, उन्हें देख कर खुशी होगी। एक रात मैंने सपने में देखा कि पिताजी कमरे में वह तस्वीर देखने आए और चले गए। अगली सुबह हमें पड़ोस के फोन पर उनके स्वर्गवास की दुःखद खबर मिली।
No comments:
Post a Comment