Tuesday, 24 January 2017

रेस

रेस जीतना सभी को पसंद है। खासकर बच्चों को तो यह बहुत पसंद है। प्रतिस्पर्धा मानो जीवन को गति दिए रहती है। बचपन में जोधपुर मेल से बड़े भाई के पास जाते हुए, जब ट्रेन छोटे-छोटे स्टेशनों पर नहीं रुकती थी, तो एक रोमांच का अनुभव होता था। रात में तो इन स्टेशनों पर हरी लालटेन दिखाता व्यक्ति मानो कहता: "जाओ, जाओ.. हमारा छोटा स्टेशन बड़ी रेलगाड़ियों के लिए नहीं है!" और ट्रेन झटपट उस अंधेरे में डूबे स्टेशन से दूर निकल जाती। हर स्टेशन से पहले और बाद के केबिन में भी लहरा रही हरी लालटेन आगे बढ़ने का संदेश दे रही होती। दिन में उन केबिन की दीवारों पर हम बड़ा-बड़ा लिखा देखते: "सावधानी हटी, दुर्घटना घटी"। बाल-मन इसकी अपने ढंग से व्याख्या कर उसमें उलझ जाता: "जब ट्रेन सावधानीपूर्वक हटी (यानि आगे बढ़ी) तो फिर दुर्घटना कैसे घट गई?" शायद इसीलिए सब कहते हैं: "क्यों बच्चों जैसी बातें कर रहे हो!"

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