Monday, 23 January 2017

छोटे-छोटे हाथ

पटियाला के रेलवे माल-गोदाम से सटी सड़क पर जब दोपहर को एक आइसक्रीम वाला भाई साइकिल पर जाता था, तो दूर सामने हम अपने क्वार्टर की खिड़की से हाथ निकाल कर उसे बुलाते। कभी देख लेने पर वह आ भी जाता और छुरी से काट कर 'मलाई-बर्फ' एक पत्ते पर रख कर देता। कई बार लगता, वह हमारे छोटे-छोटे हाथ इतनी दूर से कैसे देख लेता है! धीरे-धीरे समझ आया कि बचपन में जो दूरी हमें 'बहुत दूर' लगती थी, वास्तव में वह उतनी थी नहीं। इसी तरह करनाल नहर जो हमें बचपन और सपनों में डराती रही.. कुछ समय पहले, उधर से गुजरने पर, उसका बहाव एकदम सामान्य लगा! (छोटा बच्चा जानके हमको न डराना रे!) उन छोटे-छोटे हाथों को समर्पित है यह पोस्ट!

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