Thursday, 19 January 2017

जो न दे उसका भी भला!

..तो एग्ज़ाम में पास होने के हम सब बचपन में अनेक टोटके आज़माते थे। तोते का झूठा फल खाने से लेकर नीलकंठ पक्षी से दुआ मांगने तक - 'नीलकंठ तुम नीले रहो, तुम्हारे पंख सुनहरी रहें, रामजी से कहकर, बस, इस बार पास करा देना!' आखिर कब तक ऐसे चलता। कई बार तो मन करता कि सबसे पहले ही 'उत्तर (न लिखी) पुस्तिका' मास्टरजी को पकड़ा दें.. शायद सफाई के ही 5-10 अंक मिल जाएं। अब, भई, आपसे यह पूछना तो उचित नहीं कि क्या कभी आपके साथ भी ऐसा हुआ है कि एक भी सवाल न आता हो? हम तो ऐसे में मास्टर जी के पास से गुज़रते ऐसा गंभीर मुंह बनाते थे जैसेकि सारे ही सवाल आते हैं, पहले कौनसा करें! कोई अन्य छात्र दाएं-बाएं से देखता था तो हम हर बार गंभीर मुद्रा में प्रश्न-पत्र ही पढ़ कर टाइम पास कर रहे होते थे! ऊपर ही क्या-क्या 'वार्निंग' लिखी होती थीं: "अंदर कहीं भी अपना नाम, रोल नंबर न लिखें। कोई चिह्न आदि न बनाएं"। हमने तो एक बार यहां भी भगवान का नाम लेकर पहले पेज पर एक प्रशंसा-पंक्ति लिख दी थी: "यह देश है दानवीरों का!" और अंतिम पृष्ठ पर एक याचना-पंक्ति: "जो न दे उसका भी भला!" भला, किसका दिल नहीं पसीजेगा ऐसे में! "बेचारे बच्चे ने कितनी मेहनत की होगी डर-डर कर यह लिखने में..जा, बेटा, जा तू अगली क्लास में!!"

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