आमतौर पर तो आर्ट-टीचर संवदेनशील ही होते हैं। पता नहीं हमारे सातवीं-आठवीं के आर्ट-टीचर ऐसे क्यों नहीं थे। थोड़ी-बहुत डांट-डपट तो ठीक है। पर वह तो सज़ा पाए छात्र को ही कहते थे, "जा, बेटा, पेड़ से अपनी पसंद की छड़ी तोड़ ला पिटाई के लिए!" ..भाई साहब, आधी जान तो ऐसे ही निकल जाती थी। कुछ खुद निकाल लेते थे स्वयं को मार-मार कर कि कौनसी डंडी 'सलेक्ट' करें। रही-सही कसर वह पूरी कर देते थे! डंडी लेकर क्लास तक का सफर कुछ ऐसा लगता था.. 'हम आज अपनी मौत का सामान ले चले!'
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