पुरानी यादें उकेरना एक तरह से मन के भीतर झांकना भी है कि आखिर क्यों कोई पचास-साठ साल पुरानी बात याद रह जाती है और कोई दस साल पुरानी बात भी हम भूल जाते हैं। शायद कौतूहल और विलक्षणता सब से पहले एक बाल-मन को आकर्षित करती है। करनाल रेलवे स्टेशन पर काम करते पिता जी को 'ऑन ड्यूटी' लखनऊ जाना था। रेलगाड़ी की बजाय उनका अकेले जा रहे इंजन से जाना हमारे लिए विलक्षण था (शायद आगे दिल्ली से ट्रेन ली हो)। वापस लौटते हुए वह मेरे लिए एक ट्राइसिकल लाए थे। मैं तब तीन-चार साल का था। उन दिनों वहां 'फ्लाइंग एक्सप्रेस' का बिना रुके तेज़ गति से निकल जाना भी बच्चों के लिए कौतूहल भरा था। घर के सामने से ही कभी-कभी एक आर्मी ट्रक गुज़रता था। बच्चों के हाथ हिलाने पर वह स्नेहवश रुक जाए और सामने मोड़ तक घुमा लाए, यह तो बड़ी बात थी ही! एक और, जिसे मैं एक तीन साल के बच्चे के रूप में अपनी सबसे पहली स्मृति कहूंगा, बड़ी अजीब-सी है -- ट्राइसिकल से भी पहले की एक 'सवारी'! हमारे क्वार्टर के सामने ही रेलवे स्टेशन पर जाने की दो-तीन सीढियां थीं। वहीं दूसरी सीढ़ी पर हम यूं सवारी करते। एक-डेढ़ फुट का एक लकड़ी का तख्ता लेते। उसके नीचे एक साधारण तार रखते जो कुछ Z के आकार में मुड़ी होती थी। फट्टे पर बैठ कर एक हाथ से इसका बाहरी सिरा घुमाने पर हम चार-पांच बार में सीढ़ी की लंबाई पार करते। ..फोटो में स्टेशन का वह बाहरी भाग आज भी याद है। प्लेटफॉर्म भी जहां भाग कर 'टी-स्टाल' से मैं एक आने का एक 'केक' लाता था!..
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