Sunday, 29 January 2017

डमर बहादुर

स्कूल शुरू हुए कुछ समय बाद डमर बहादुर ने हमारी पहली क्लास में दाखिला लिया था। पहले ही दिन उसे एक थप्पड़ पड़ गया था। मैडम जी को उसने 'मौसी जी' कह दिया था। छुट्टी होने पर मैंने उसे ढाढ़स बंधाया। घर का पता पूछने पर पता चला कि उसका घर भी हमारे रेलवे क्वार्टर के किसी अलग ब्लॉक में है। उसके पिता चौकीदार थे। अपने नाम के मुताबिक वह खुद भी बहुत बहादुर था। मैं भी उससे डरता पर पढ़ाई में उसका ध्यान रखता। एक दिन उसने क्लास में एक इंच जितनी छोटी पेंसिल मुझे दी। वह मुझ से सुखवंत ने ले ली और लौटाना भूल गया। छुट्टी होने पर डमर ने वह वापिस मांगी। डर कर मैं सुखवंत के घर वह लेने गया। कई बार मैं डमर को उसके घर तक छोड़ने जाता। रास्ते में एक बड़ा लड़का, मदन, जब-तब मुझे परेशान करता था। डमर के साथ उसके घर के सामने से गुज़रने पर इच्छा होती थी कि अब वह आकर कुछ कहे। एक बार सचमुच ही वह मिल गया और पंगा लेने लगा। पलक झपकते ही डमर ने उसे नीचे पटक दिया था। उसके बाद वह कुछ नहीं बोला। सालों बाद, मुझे लगता, डमर ज़रूर आर्मी में गया होगा। कई बार तो 26 जनवरी की परेड में 'गोरखा रेजिमेंट' के जवान देखकर मुझे उसकी याद आती!

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