Tuesday, 22 October 2019

सरजी-कल-स्ट्राइक

सर्जिकल स्ट्राइक!..

"खूब गुज़रेगी जब मिल बैठेंगे शरीफज़ादे दो!" ना, ना..  एक शरीफ दूसरे शरीफ को एक्सटेंशन नहीं दे रहा। सेनापति जी अगले माह रिटायर हो रहे हैं। कारण --

शरीफ 1: आप सोते रहे.. खबर इंटरसेप्ट क्यों नहीं की?

शरीफ 2: "सरजी-कल-स्ट्राइक" सुन पड़ा था। सोचा, कल वो हड़ताल पर हैं। हम भी सो गए!..

पार्ट-2: बताओ भला.. (अब वो प्रूफ मांग रहे हैं!)

अब सरे आम कोई कहेगा कि "हां, मुझे पीट गए या मैं पिट गया!" यह तो बिग ब्रदर्स के सामने रोने वाली बातें होती हैं। हम भी बचपन में पिट-पिटाकर 'मुस्काते हुए' घर आते थे कि कहीं और बच्चे भी मज़ाक न उड़ाएं। घर आते ही फिर जी भरके दहाड़ते थे!..

Thursday, 10 October 2019

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I don't know about your horror videos.. one should refrain from such things.. existence of ghosts is different issue.. when a hollywood movie *The Exorcist* was released, it was claimed that none could see it alone in the theatre for which big prizes were announced.. even an ambulance was used to be parked outside.. it shows clearly there are no ghosts present in the theatre.. one is just seeing the movie on screen.. even then, he could be fainted.. shows strength of one's mind and heart.. as the screen-effect make us weak and fearful; similarly, belief in God and its ritual fill our heart with positive vibrations to fight against negativity.. follow this way pls!

Monday, 7 October 2019

बॉम्बे इंजन

'बॉम्बे इंजन'!

सन 1960 में पिता जी करनाल रेलवे स्टेशन पर टिकट बाबू थे, बड़े भैया चंदौसी में तार बाबू की ट्रेनिंग कर रहे थे.. मैं तब रेलवे क्वार्टर के बाहर खड़ा आती-जाती रेलगाड़ियां देखता रहता। 'फ्लाइंग एक्सप्रेस' तब वहां नहीं रुकती थी। हम सब बच्चे इसकी तेज रफ्तार से बहुत डरते थे। पता नहीं क्यों इसके गोलमटोल इंजिन को हम 'बॉम्बे इंजन' कहते थे। अक्सर एक आर्मी ट्रक उधर से गुजरता। हम बच्चों के हाथ हिलाने पर वह रुक जाता। कुछ जवान हमें उसमें बिठाते और पास ही रेलवे फाटक पर उतार देते। हम वहां से वापस घर भाग आते। फाटक बंद होने पर समझ जाते कि कोई रेलगाड़ी आएगी -- उसकी प्रतीक्षा करते और 'बाय' करते। एक बार पिता जी को दफ्तर के जरूरी काम से लखनऊ जाना था। किसी गाड़ी का समय नहीं था। एक अकेला इंजन जा रहा था। वह उसीमें चले गए थे। ऐसी अजीब बात तो याद रहेगी ही। जाते हुए उन्होंने प्लेटफॉर्म के स्टाल से मुझे एक आने का एक केक भी दिलाया था। और लौटने पर मेरे लिए एक ट्रायसिकल भी लाए थे। करनाल से हम पटियाला चले गए थे और 1965 में दिल्ली आए। करनाल होते हुए पटियाला घूम आने का बहुत मन है।