Monday, 20 November 2023

..तो

"तो?"

- बच्चों की आवाज़ बहुत महीन होती है -- बिल्कुल महिलाओं जैसी।
- तो?
- लता जी ने सैंकड़ों गाने छोटे लड़कों के लिए गाए हैं।
- तो?
- फोन की घंटी बजने पर बच्चे ही ज़्यादातर फोन उठाने भागते हैं।
- तो?
- छुट्टियों में घर आया मेरा बेटा भी ऐसा ही करता है।
- तो?
- अरे, "तो", तो क्यों पोस्टर चिपका रहे हो -- आपके कमरे में कोई रहता है! हम नही कहते ज़माना कहता है!!

पैकेज

साठ हज़ार के पैकेज से साठ पैसे (प्रति शब्द अनुवाद कार्य) पर आ गया.. वो भी कट-कटा कर पचास पैसे पर ही बात आ जाती है। रूठा-हुआ-सा हनुमान जी की ओर देख रहा था। मन में आवाज़ आई: 'जैसा तू मेरे साथ कर रहा है, मैं तेरे साथ कर रहा हूं.. पूरा एपिसोड याद कर जब मेरे बर्थ-डे पर प्रसाद चढ़ाने आया था!' ..अब पचास-साठ पैसे की आमदनी से हनुमान-जयंती पर क्या हलवा-पूरी का भोग लगाता। सोचा, बेसन के लड्डू का भाव पूछ लेते हैं। देशी घी का एक लड्डू बीस रुपये का, नॉर्मल दस का, बीस की बूंदी भी ले ली कि लिफाफा बड़ा-सा लगे। हनुमान जी के चरणों में केवल एक रुपये का सिक्का रखा था, 'इसलिए बुरा मान गए?' --'न, न.. आगे की उलट-फेर में झांक!' .. याद आया, मैंने देशी घी का लड्डू लिफाफे में नीचे कर, ऊपर नार्मल वाला रख दिया था कि पंडित जी उसे ही निकालें और देशी घी वाला हम चाय के साथ खा लेंगे!.. पर पहचान ही नही हुई कि कौनसा देशी घी का है! तभी पंडित जी ने लिफाफा पकड़ा और हनुमान जी के मुख को स्पर्श कराते हुए सारे-का-सारा हमें वापस कर दिया.. जो प्रसाद उन्होंने हमें दिया, उसमें एक पांच का सिक्का अलग मिल गया.. 'रिटर्न-गिफ्ट'! देशी घी के लड्डू ने नियत में खोट तो ला ही दी थी! अब कान पकडने से क्या होता है!..

Tuesday, 22 October 2019

सरजी-कल-स्ट्राइक

सर्जिकल स्ट्राइक!..

"खूब गुज़रेगी जब मिल बैठेंगे शरीफज़ादे दो!" ना, ना..  एक शरीफ दूसरे शरीफ को एक्सटेंशन नहीं दे रहा। सेनापति जी अगले माह रिटायर हो रहे हैं। कारण --

शरीफ 1: आप सोते रहे.. खबर इंटरसेप्ट क्यों नहीं की?

शरीफ 2: "सरजी-कल-स्ट्राइक" सुन पड़ा था। सोचा, कल वो हड़ताल पर हैं। हम भी सो गए!..

पार्ट-2: बताओ भला.. (अब वो प्रूफ मांग रहे हैं!)

अब सरे आम कोई कहेगा कि "हां, मुझे पीट गए या मैं पिट गया!" यह तो बिग ब्रदर्स के सामने रोने वाली बातें होती हैं। हम भी बचपन में पिट-पिटाकर 'मुस्काते हुए' घर आते थे कि कहीं और बच्चे भी मज़ाक न उड़ाएं। घर आते ही फिर जी भरके दहाड़ते थे!..

Thursday, 10 October 2019

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I don't know about your horror videos.. one should refrain from such things.. existence of ghosts is different issue.. when a hollywood movie *The Exorcist* was released, it was claimed that none could see it alone in the theatre for which big prizes were announced.. even an ambulance was used to be parked outside.. it shows clearly there are no ghosts present in the theatre.. one is just seeing the movie on screen.. even then, he could be fainted.. shows strength of one's mind and heart.. as the screen-effect make us weak and fearful; similarly, belief in God and its ritual fill our heart with positive vibrations to fight against negativity.. follow this way pls!

Monday, 7 October 2019

बॉम्बे इंजन

'बॉम्बे इंजन'!

सन 1960 में पिता जी करनाल रेलवे स्टेशन पर टिकट बाबू थे, बड़े भैया चंदौसी में तार बाबू की ट्रेनिंग कर रहे थे.. मैं तब रेलवे क्वार्टर के बाहर खड़ा आती-जाती रेलगाड़ियां देखता रहता। 'फ्लाइंग एक्सप्रेस' तब वहां नहीं रुकती थी। हम सब बच्चे इसकी तेज रफ्तार से बहुत डरते थे। पता नहीं क्यों इसके गोलमटोल इंजिन को हम 'बॉम्बे इंजन' कहते थे। अक्सर एक आर्मी ट्रक उधर से गुजरता। हम बच्चों के हाथ हिलाने पर वह रुक जाता। कुछ जवान हमें उसमें बिठाते और पास ही रेलवे फाटक पर उतार देते। हम वहां से वापस घर भाग आते। फाटक बंद होने पर समझ जाते कि कोई रेलगाड़ी आएगी -- उसकी प्रतीक्षा करते और 'बाय' करते। एक बार पिता जी को दफ्तर के जरूरी काम से लखनऊ जाना था। किसी गाड़ी का समय नहीं था। एक अकेला इंजन जा रहा था। वह उसीमें चले गए थे। ऐसी अजीब बात तो याद रहेगी ही। जाते हुए उन्होंने प्लेटफॉर्म के स्टाल से मुझे एक आने का एक केक भी दिलाया था। और लौटने पर मेरे लिए एक ट्रायसिकल भी लाए थे। करनाल से हम पटियाला चले गए थे और 1965 में दिल्ली आए। करनाल होते हुए पटियाला घूम आने का बहुत मन है।

Wednesday, 4 September 2019

आओ लकीर पीटें!

आओ लकीर पीटें (बुद्धिजीवी बनें!)

सांप तो कभी का जा चुका। आओ हम लकीर ही पीट लें -- कहां से आया, कैसे आया, कहां गया। कोई दूरदर्शी ही किसी संभावित खतरे की बात कहता है। कुछ उस से निपटने की तैयारी भी करते हैं। पर एक बड़ा वर्ग तो कुछ हो जाने पर ही अपनी 'फीड बैक' देता है। यह कौनसा आसान काम है। उसके लिए लकीर पीटनी पड़ती है। ऐसे ही थोड़े कोई बुद्धिजीवी का दर्जा हासिल कर लेता है। ऐसे लोग तो हमें जरा नहीं सुहाते जो कहते हैं "अब लकीर पीटने से क्या फायदा"। ऐसे लोग ही बुद्धिजीवियों की दुकान, सम्मेलन, गोष्ठियां, कॉफी हाउस की 'वर्क शॉप' आदि बंद कराना चाहते हैं। वे भूल जाते हैं कि नवनिर्माण उनकी 'फीड बैक' पर ही तो होगा। एक तरह से सारा संचारतंत्र बुद्धिजीवियों की इस विचारशिला पर ही टिका है। बरसों पहले रेडियो पर एक प्रोग्राम भी आता था "आओ तबसरा करें"। अर्थात जो हो गया उसका लेखा-जोखा रखें। पूर्व चेतावनी देने वाली दूरदर्शिता अब कहां। 'यूरेका' 'यूरेका' चिल्लाता नवीनता का संदेश लिए हुए अब कौन भागता है!

                  

                        आधुनिक आर्किमिडीज़!

Wednesday, 28 August 2019

अर्जित आशीर्वाद

'अर्जित' आशीर्वाद!

कमंडल में पांच-दस का नोट डाल कर, लगता है,  'खुश रहो' का आशीर्वाद खरीद लिया; 'अर्न' नहीं किया -- काम-से-कम इतना तो हमें करना ही चाहिए। बरसों पुरानी यह परंपरा भी हमने उन्हें समझा-बुझा कर तोड़ दी कि अब तक हम उनसे पूछते रहे 'फलां काम कब बनेगा' आदि; अब वे अपनी कोई समस्या लेकर आएं और हमें कुछ करने का अवसर दें। तभी हम उनका आशीर्वाद सही अर्थ में ग्रहण कर पाएंगे। कुछ ने मज़ाक समझा, कुछ ने 'कॉस्ट कटिंग' (कि 1100 की पेंशन में तो बस-मेट्रो का ही पूरा पड़ता होगा)।। अंततः आज एकादशी वाले पंडित जी आ ही गए, नए अंदाज़ में, बिना कमंडल - 'सोचा, आज हम अपनी समस्या का हल आपसे पूछ ही लें।' हम भी उनके आगमन से अनुगृहीत हुए। कंसलटेंट होने की-सी फीलिंग अलग आई। आमने-सामने बैठ कर बोले: 'मंदिर का निर्माण कराने की इच्छा है, रूकावटें बहुत आ रही हैं, क्या करें?'  हमने समझाया: 'क्यों भगवान जी को एक जगह स्थापित कर रहे हैं। मोबिलिटी का ज़माना है। उन्हें पालकी, बग्घी में घुमाइए। जो लोग मंदिर नहीं जा पाते, उन्हें भी अपनी बालकनी से दर्शन का सौभाग्य प्राप्त होगा।' ..हमारी पीठ थपथपा कर बोले: आज यह आपका "अर्जित" आशीर्वाद है! (ठीक नहीं चल रही हमारी सेकंड इनिंग्स?)