Wednesday, 28 August 2019

अर्जित आशीर्वाद

'अर्जित' आशीर्वाद!

कमंडल में पांच-दस का नोट डाल कर, लगता है,  'खुश रहो' का आशीर्वाद खरीद लिया; 'अर्न' नहीं किया -- काम-से-कम इतना तो हमें करना ही चाहिए। बरसों पुरानी यह परंपरा भी हमने उन्हें समझा-बुझा कर तोड़ दी कि अब तक हम उनसे पूछते रहे 'फलां काम कब बनेगा' आदि; अब वे अपनी कोई समस्या लेकर आएं और हमें कुछ करने का अवसर दें। तभी हम उनका आशीर्वाद सही अर्थ में ग्रहण कर पाएंगे। कुछ ने मज़ाक समझा, कुछ ने 'कॉस्ट कटिंग' (कि 1100 की पेंशन में तो बस-मेट्रो का ही पूरा पड़ता होगा)।। अंततः आज एकादशी वाले पंडित जी आ ही गए, नए अंदाज़ में, बिना कमंडल - 'सोचा, आज हम अपनी समस्या का हल आपसे पूछ ही लें।' हम भी उनके आगमन से अनुगृहीत हुए। कंसलटेंट होने की-सी फीलिंग अलग आई। आमने-सामने बैठ कर बोले: 'मंदिर का निर्माण कराने की इच्छा है, रूकावटें बहुत आ रही हैं, क्या करें?'  हमने समझाया: 'क्यों भगवान जी को एक जगह स्थापित कर रहे हैं। मोबिलिटी का ज़माना है। उन्हें पालकी, बग्घी में घुमाइए। जो लोग मंदिर नहीं जा पाते, उन्हें भी अपनी बालकनी से दर्शन का सौभाग्य प्राप्त होगा।' ..हमारी पीठ थपथपा कर बोले: आज यह आपका "अर्जित" आशीर्वाद है! (ठीक नहीं चल रही हमारी सेकंड इनिंग्स?) 

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