Wednesday, 7 August 2019

लुका-छुपी

- "कहां हो, पिया?"

.."यहां हूं मैं -- यहां!" कभी ऐसी लुका-छुपी.. और एक दिन वह ऐसी छुपी कि उसकी जान ही निकल गई। पहले तो वह यहां-वहां के अनुमान ही लगाता रहा। कुछ दिन पहले ही उसने कहा था कि कई बार ट्रेवल के कारण वह बात नही कर पाती। -- ट्रेवल क्यों, वह सोचता। शायद कहीं उसकी शादी की बात चल रही हो.. या शायद इंगेजमेंट या शादी ही हो गई हो। यहां तक तो वह सोचता कि अब तो उसी पर है, वह फिर कभी बात करे, न करे.. दिल उसे खुश रहने की विश भी देता। एक और बात से मन सिहर जाता -- कहीं उसे कुछ हो तो नहीं गया.. वह हॉस्पिटल में तो नहीं.. या उसके डिलीट न किए मैसेज किसी ने देख न लिए हों.. वह भी क्यों उसे यह सब लिखता रहता था.. अब कैसे उसका पता लगाएगा कि वह ठीक है। उसका फोन नम्बर तो उसके पास है.. पर अगर किसी और ने बात की तो क्या कहेगा, कौन हूं वह.. मन पक्का किया, यह पूरा महीना प्रतीक्षा और प्रार्थना। कुछ पता न चल पाने पर, पहली तारीख को फोन करेगा। किसी और ने बात की तो कह देगा, पिया मुझे ऑनलाइन मराठी सिखाती थी और मैं छुटपुट एस्ट्रोलॉजी। "बस, इतना बता दें, वह ठीक तो है?" अगर किसी ने फोन ही न उठाया, फिर..? वह क्या कर सकता था.. डूबते को तिनके का सहारा.. पिया की एक दोस्त सुरभि को फ्रेंड रिक्वेस्ट भेजी कि एक ही सरनेम होने से शायद दोनों कज़न हों.. शायद कभी वह बता पाए कि पिया को क्या हुआ। बस, ऐसे ही दिन बीत रहे थे। बादलों में धुंधला हुआ चांद देख कर भी एक सवाल मन में उभरता था कि वह पूरी तरह छुपने जा रहा है या प्रकट होने। अप्रत्याशित रूप से बादलों की ओट से चांद पिया का मैसेज लेकर निकला, "मैं ठीक हूं.. नेटवर्क खराब है!"

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