Wednesday, 14 August 2019

चलने की तैयारी

चलने की तैयारी..

1970s: रेलगाड़ी के सफर के लिए, रात बारह-एक बजे तक अम्माजी मट्ठी, नमकपारे, पंजीरी आदि बनाती थीं। बड़े भाई लोग ट्रंक लगाते और बिस्तरबंद बांधते। हम अपने खिलौने बटोरते।

1990s: हवाई यात्रा के लिए हम सूटकेस लगाते, कागजपत्र, पासपोर्ट, क्रेडिट कार्ड आदि संभालते। मैडम सजधज कर पड़ोसियों से पिन मांगने जातीं। बेटी कहती, "मम्मी अपना मेकअप दिखाने गयीं हैं!" बेटा याद दिलाता रहता: "यह रख लिया..वह रख लिया?"

अब करीब हर रात ही सोने से पहले हम बेटे को याद दिलातेे रहते हैं, "अपना लाइसेंस, एटीएम ठीक जगह रखा है? कार में पेट्रोल खाली तो नहीं? रात में हमारी कार के पीछे तो कोई अपनी कार पार्क नहीं कर जाता?" कभी बिना पूछे ही कह देते, "लॉकर की चाबी यहां रखी है.. एफ-डी वहां रखी है.. साइन की हुई है।" एक बार बेटे को कुछ-कुछ समझ आ गया, जब हमने (रात्रि प्रवचन में) कहा: "कभी सीने में दर्द हो तो पेट दर्द की दवा से एक एस्प्रिन देना बेहतर है।" हम तो अब भी अपनी कच्ची-पक्की मेडिकल स्कीम के भरोसे हैं; पर उसने मेडिकल इंशोरेंस के लिए जोर देना शुरू किया है।

चौथी क्लास में पढ़ी एक कहानी अब समझ आती है: एक संत महात्मा युवावस्था में ही मरघट में जाकर  बैठ गए थे। लोगों ने पूछा तो कहने लगे: "एक दिन यहीं तो आना है। क्यों किसी को कष्ट दें!"

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