हमारी 'फेयरी क्वीन' विदेशियों की पसंदीदा ट्रेन है। इसका इंजन विश्व का सबसे पुराना स्टीम इंजन है। पिछले दिनों के प्रदूषण का प्रभाव इस ट्रेन पर भी पड़ा। इस सीजन के दूसरे ट्रिप, 11 नवम्बर, में ही इसमें मात्र 11 यात्री थे। इनमें भी कोई विदेशी पर्यटक शामिल नहीं था। विदेशी पर्यटक कम होने का एक कारण इसका शॉर्ट ट्रिप भी बताया जा रहा है। पहले फेयरी क्वीन, अलवर के सरिस्का तक, दो दिन का ट्रिप कराती थी। पिछले दो सालों से इसका ट्रिप रेवाड़ी तक कर दिया गया, जबकि रेवाड़ी टूरिस्ट स्पॉट नहीं है। शायद यह सीएमडी श्री अश्वनी लोहानी की अनुपस्थिति में लिया गया निर्णय है। (इस अवधि में वह लगभग दो वर्ष के लिए एयर इंडिया के सीएमडी रहे।)
फेयरी क्वीन की मेंटेनेंस रेवाड़ी हेरिटेज लोको शेड में की जाती है। 2012-15 के मध्य बॉयलर में खराबी के कारण यह ट्रैक पर नहीं आ पाई। 2016 में जब यह दोबारा आई तो पर्यटकों में इसका अत्यधिक क्रेज़ था। इस ट्रेन की वापसी डीज़ल इंजन से हो रही है। यह भी इसके आकर्षण में कमी का एक कारण है। इसका तकनीकी कारण है रेवाड़ी पर इंजन मोड़ने की व्यवस्था न होना। वर्तमान स्थिति में इसे मोड़ने पर 2-3 घंटे का समय लग सकता है जिससे अन्य रेलगाड़ियों में भी देरी होगी। ट्रेन के दोनों ट्रिप में बायलर में खराबी आना चिंता की बात है। पहले ट्रिप में गढ़ी हरसरु स्टेशन के निकट बॉयलर खराब हो गया था। किसी तरह लो स्पीड पर ट्रेन को गंतव्य तक लाया गया। दूसरी बार आरम्भ से ही बॉयलर काम नहीं कर रहा था। किसी तरह लो प्रेशर में ही इंजन को रवाना किया गया; किंतु इसके कहीं भी रुकने का डर बना रहा। अप्रैल 2018 तक फेयरी क्वीन हर दूसरे शनिवार को रवाना होगी। अब रेवाड़ी के सफर के दौरान इसमें 2 टन कोयले और 9000 लीटर पानी की आवश्यकता होती है। पानी का टैंकर छोटा होने के कारण इसे रास्ते में दो जगह रोका जाता है। इसका सामान्य किराया 6480 तथा बच्चों के लिए 3240 है। कुछ समय पहले ही 'करीब करीब सिंगल' फिल्म की शूटिंग में भी फेयरी क्वीन का उपयोग किया गया। (साभार: न.भा.टा)
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