सीता नवमी पर चरणवंदन!
मांगने वाले सपने में भी कुछ-न-कुछ जुगाड़ लगाते रहते हैं। रोजाना ही यह पंक्तियां पढ़ कर सोता हूं: 'अष्ट सिद्धि नव निधि के दाता, अस बर दीन जानकी माता'.. जाने क्या सूझी, अबकि सीता माता से प्रार्थना ही करने लग गया:
-- "जिस तरह आपने हनुमानजी को अष्ट सिद्धि नव निधियां प्रदान की हैं.. कुछ एकाध रत्ती मुझे भी दे दो!"
-- "चल हट!"
-- "मतलब फिर कभी।" मन रुआंसा-सा हो गया। कुछ समय बाद फिर उनके दरबार में पहुंच कर चुपचाप खड़ा हो गया।
-- "अब क्या है?"
-- "आपने फिर आने को कहा था.. मतलब मैंने ऐसा मान लिया था.. (दिव्य शक्तियों के सम्मुख झूठ नहीं बोलना चाहिए। उन्हें सब मालूम होता है।)
सीता माता की मुस्कुराहट देख मैं पुनः बोल उठा:
-- "मतलब अगली बार!.. थैंक्स!"