Monday, 13 May 2019

अगली बार!

सीता नवमी पर चरणवंदन!

मांगने वाले सपने में भी कुछ-न-कुछ जुगाड़ लगाते रहते हैं। रोजाना ही यह पंक्तियां पढ़ कर सोता हूं: 'अष्ट सिद्धि नव निधि के दाता, अस बर दीन जानकी माता'.. जाने क्या सूझी, अबकि सीता माता से प्रार्थना ही करने लग गया:
-- "जिस तरह आपने हनुमानजी को अष्ट सिद्धि नव निधियां प्रदान की हैं.. कुछ एकाध रत्ती मुझे भी दे दो!"
-- "चल हट!"
-- "मतलब फिर कभी।" मन रुआंसा-सा हो गया। कुछ समय बाद फिर उनके दरबार में पहुंच कर चुपचाप खड़ा हो गया।
-- "अब क्या है?"
-- "आपने फिर आने को कहा था.. मतलब मैंने ऐसा मान लिया था.. (दिव्य शक्तियों के सम्मुख झूठ नहीं बोलना चाहिए। उन्हें सब मालूम होता है।)
सीता माता की मुस्कुराहट देख मैं पुनः बोल उठा:
-- "मतलब अगली बार!.. थैंक्स!"

Saturday, 20 April 2019

आई बो!

अब ऐसा मांझा बैन है..

यक़ीन नहीं आता कि ऐसा था हमारा बचपन! बिग-बी (बड़े भैया) और मैं सारी दोपहर पतंग का मांझा बनाने की तैयारी में लगे रहते। उसमें उपयोग होने वाली कुछ चीज़ें होतीं - सरेश, नीला थोथा, बारीक़ पिसा कांच और अंडा। पड़ोस वालों की 🦃 मुर्गी पकड़ कर 2-4 घंटे के लिए अपने बड़े-से खुले ड्रम में बिठा देते थे - अंडा दे जाए तो ठीक, नहीं तो 🐦कबूतरों के घौंसले तलाशते! बल्ब का पतला कांच मिल जाए तो ठीक वरना किसी से भी काम चला लेते। ईमाम-दस्ता हमें कोई नहीं देता था कि हम उसमें कांच कूटेंगे। धागे की सामान्य रील को हम मज़बूत मांझे के गोले में बदल देते। ऐसे खतरनाक खिलाड़ियों के लिए पतंग घर पर बनाना तो छोटा-सा काम था!..

Friday, 19 April 2019

अनकहे बोल..

() हनुमान जन्मोत्सव पर ()

अनकहे बोल..

--"हनुमंत,
चूड़ामणि लेने आने का तो
तुम्हारा एक बहाना है..
लंका-दहन के पश्चात
तुम मेरी कुशलता
जानने को
चिंतित थे न?"

-- "हां, मां!
मैं पल भर को
भूल गया था कि
कुछ देर पहले ही जिस
सीता माता ने मुझे
अष्ट-सिद्धि नव-निधि का
वरदान दिया था
उनका अहित
कौन कर सकता है!"

Wednesday, 17 April 2019

अपना-अपना एंटीना

अपना-अपना एंटीना

अपना-अपना एंटीना!

पचास साल पहले रेडियो सीलोन पर बुधवार रात सात से आठ बजे अमीन सयानी का प्रोग्राम 'बिनाका गीतमाला' सुनने के लिए ट्रांजिस्टर का एंटीना कई बार ऊपर-नीचे करने पर ही कुछ ठीक आवाज़ आती थी। सबको बड़ी प्रतीक्षा रहती थी कि कौनसा गाना किस पायदान पर है और टॉप किसने किया। अब वीकेंड पर सब अपने वाई-फ़ाई सिस्टम दुरूस्त करने में लगे रहते हैं कि विदेश में रह रहे बच्चों से आराम से वीडियो-चैट हो जाए। यह सब निपट जाने पर, बेटी मुझे मोबाइल पर कॉल करती है कि इन सबसे बेखबर 'पापा जी' पार्क में टहल रहे होंगे। वीडियो न होते हुए भी हमारी बात कुछ यूं शुरू होती है कि मानो हम एक-दूसरे के सुख-दुःख प्रत्यक्ष देख रहे हों। कई बार वह पूछती: 'पापा, आप इतनी सहज और 'एक्यूरेट' बातें कैसे कर लेते हैं?' मैं कहता कि मैं, बस, अपना एंटीना ठीक रखता हूं! और कुछ बातें अपने-आप हो जाती हैं। 'जैसेकि..?'  'जैसेकि बरसों पहले, 22 जुलाई को, मैंने टॉवल से हाथ पौंछे और उसकी चार तह करके बेड के उस ओर रख दिया जहां तुम उछल-कूद कर रहे थे।' ..'और अचानक गिरने पर उसी से मेरा बचाव हो गया था। भौहों के पास हल्का-सा कट का निशान अब भी है।'  एक और नया अनुभव भी सामने आया। जब बच्चे विदेश की बजाय स्वदेश में होते हैं तो अपनी ज़मीन से उठी तरंगे अधिक सशक्त और संवेदनशील होती हैं। नन्ही प्रिशा ने तो अभी बोलना भी नही सीखा। फिर वह मेक्सिको रहे या बेंगलोर, बात तो एक ही है। पर नहीं.. अपने देश में होने के अहसास में ही एक अनोखी मिठास है!

Friday, 29 March 2019

प्लास्टिक के लोग!

प्लास्टिक के लोग!

पहले लोग एक-दूसरे को
शुभकामनाओं सहित
फूलों के गुलदस्ते भेजते थे
(कुछ अब भी गुलाब के फूल की
एकाध टहनी भेजते हैं)
फिर नकली प्लास्टिक के
फूलों का ज़माना आया
और चला भी गया
अब डिजिटल फूल
हंसती इठलाती स्माइलियां
सरल सर्वत्र उपलब्ध हैं
मुफ्त ..
पर अब लोग व
मानदंड बदल गए --
अंगुली टच-स्क्रीन से ही
परहेज करनी लगी ..
कइयों के व्यक्तित्व को ही
यह सब अखरने लगा
उन्हें खुद को ही
प्लास्टिक मानव कहना
भाने लगा!

-विजय के भटनागर, 'परिक्रमा' ब्लॉग स्पॉट.कॉम

Thursday, 8 November 2018

सहृदयता

Mine 8 Nov 2017 post:

सहृदयता ..

अशोकवाटिका में सीताजी को कष्ट सहते देख देवलोक में देवी पार्वती को अपार व्यथा होती और वह शंकर भगवान से इसके निवारण को कहतीं। उनकी यह व्यथा सीताजी के प्रति सहृदयता है। अर्थात सहृदयता एक दैवीय गुण है। वर्तमान समय में भी कुछ लोग सहृदयता सम्पन्न हैं व दूसरों के दुःख में साथ देने का प्रयास करते रहते हैं। नोबल शांति पुरस्कार से सम्मानित कैलाश सत्यार्थी ऐसे ही एक सहृदय भारतीय हैं जिनका जीवन बच्चों का जीवन बेहतर बनाने लिए समर्पित है जिसके लिए वह विश्व के 150 देशों के 83000 से अधिक बच्चों के लिए कार्य कर चुके हैं। कुछ अन्य लोग भी अपने क्षेत्र में इसी सहृदयता से कार्य करते रहते हैं। ऐसे व्यक्ति निश्चय ही औरों को शीतल छाया देने वाले विशाल वृक्ष की तरह हैं। दूसरी ओर, बेल अथवा कमज़ोर लताओं की यह प्रवृति अथवा विवशता है कि वे अपने निकटतम पेड़ के तने से लिपट जाती हैं।। अपने कार्य के प्रति समर्पित रहते हुए अपने कार्यक्षेत्र व अपने असंख्य कर्मचारियों के जीवन में परिवर्तन लाने का भाव श्री अश्वनी लोहानी के व्यक्तित्व में भी सहज देखा जा सकता है। उनकी कोई पोस्ट किसी भी विषय अथवा कार्य से संबंधित क्यों न हो, अनेकानेक कर्मचारी अपनी व्यक्तिगत समस्याएं उनके सम्मुख ले आते हैं। एक साधारण कर्मचारी अपने सीएमडी को अपनी पहुंच की सीमा में देखकर भावविभोर हो जाता है। यह 'अनौपचारिक मिलन'  उनकी सहृदयता ही है। औपचारिक रूप में (अंग्रेजों के समय के) 'थ्रू प्रॉपर चैनल' नियमानुसार न चलना तो स्वयं ही अनुशासनात्मक कार्रवाई के अंर्तगत आता है। शायद आज भी एक कर्मचारी अपनी कोई शिकायत एक-दो स्तर ऊपर तक ही कर सकता है। विन्रम निवेदन करूंगा, कोई भी कर्मचारी अपनी किसी शिकायत अथवा आवेदन आदि की प्रितिलिपि सीएमडी को भी सूचनार्थ भेजने को स्वतंत्र होना चाहिए ताकि एक न्यनतम अवधि तक निचले स्तर पर कोई कार्यवाही न होने पर वह उनसे मिल सके।। अंत में, जैसा व्यवहार हम औरों से चाहते हैं, हमें भी अपने संपर्क में आए लोगों से करना चाहिए। यदि हम सब मात्र अपने एक-एक निकटवर्ती घर के किसी दुःख में सहायक होने लगें तो स्वयं ही एक खुशनुमा समाज बन जाएगा!