बचपन से ही हमें रेलगाड़ी बहुत अच्छी लगती है। लगता है, रंग-बिरंगा एक पूरा शहर दौड़ रहा है और साथ-साथ सब चीज़ें घूम रही हैं! इंजन के साथ बस दो-चार डिब्बे तो हमें एक खुशनुमा परिवार का ही अहसास कराते रहे हैं। और अकेले इंजन को दौड़ते देख तो हमें लगता था, फटाफट अपने परिवार को लेने जा रहा है या ड्यूटी ऑफ कर घर भाग रहा है! रह गया उलटा इंजन -- इसने हमें बचपन से ही परेशान कर रखा है। उलटा इंजन जाते देख कर लगता है.. यह कुछ गड़बड़ करके आ रहा है..शायद किसी को कहीं छोड़ कर, किसी और से जुड़ने जा रहा है। कुछ बड़े हुए तो लगा कि जैसे यह किसी कोर्ट-केस से छूट कर भाग रहा है। धीरे-धीरे तो यह बात मन में पक्की हो गई कि यह 'डिवोर्स' देकर उलटे पांव भाग रहा है। और उस दिन तो उलटा इंजन देखने के अपशकुन पर मुहर ही लग गई जब एक बंद रेलवे क्रासिंग पर कार रोक कर हमनें एक अख़बार लिया। अभी करिश्मा कपूर के डिवोर्स की खबर पढ़ ही रहे थे कि सिटी मारता एक उलटा इंजन भाग गया!.. पंडित डॉट कॉम ने तो इसके उपाय के भी 1100 लेने शुरू कर दिए हैं। हम दोनों तो उलटा इंजन देखने पर, उस दिन बस कोई पिक्चर देख आते हैं!
Wednesday, 26 September 2018
Wednesday, 19 September 2018
शब्द और परिवेश
महात्मा गांधी जी तक तो सब ने निबंध आदि लिखे हैं। विनोबा भावे और उनके भूदान आंदोलन के बारे में नई पीढ़ी शायद ही जानती हो। (11 सितंबर को उनका जन्म दिवस भी, मालूम नहीं अब कोई मनाता भी है या नहीं।) ना, ना.. शरमाना कैसा.. हमने खुद उन्हें गूगल पर ढूंढा है और अब जन्म दिवस की शुभकामनाएं अर्पित करने में भी देर हो गई है। लगता है, गूगल की उत्पत्ति गांवों की चौपालों से हुई है जहां से देस-परदेस की सारी खबरें और घरेलू नुस्खे तक जन-जन तक पहुंचते थे। आज तो बच्चों को 'चौपाल', 'हुक्का', 'खाट' (चारपाई) जैसे शब्द माफ़िक ही नहीं आते। कहते हैं, ऐसी कोई पोस्ट हमें टैग मत कर देना, सब मज़ाक उड़ाएंगे। बात कुछ ऐसी होती भी जा रही है। अपने घर में तो कहीं भी खूंटी पर तौलिया 'लटका' लो। किसी और के घर तो 'टॉवल' सही जगह ही 'टांगना' पड़ेगा। ऐसे ही एक रोज़ हम किसी के घर इम्पोर्टेड टी-सेट की मधुर खनखनाहट से खुश हो रहे थे--पर चाय आ गई स्टील के गिलास में। बातों-बातों में हमने, बस, इतना पूछा था, 'अपना अंगोछा कहां लटकाएं?' शायद परिवेश भी शब्दों को रूप बदलने पर विवश कर देता है। बचपन में रेल के डिब्बों में Lavatory के साथ 'संडास' शब्द देख कर तो हम भी डर जाते थे। आज के प्रसाधन-कक्ष की तो बात ही निराली है!..
Monday, 3 September 2018
अपना-अपना एंटीना!
पचास साल पहले रेडियो सीलोन पर बुधवार रात सात से आठ बजे अमीन सयानी का प्रोग्राम 'बिनाका गीतमाला' सुनने के लिए ट्रांजिस्टर का एंटीना कई बार ऊपर-नीचे करने पर ही कुछ ठीक आवाज़ आती थी। सबको बड़ी प्रतीक्षा रहती थी कि कौनसा गाना किस पायदान पर है और टॉप किसने किया। अब वीकेंड पर सब अपने वाई-फ़ाई सिस्टम दुरूस्त करने में लगे रहते हैं कि विदेश में रह रहे बच्चों से आराम से वीडियो-चैट हो जाए। यह सब निपट जाने पर, बेटी मुझे मोबाइल पर कॉल करती है कि इन सबसे बेखबर 'पापा जी' पार्क में टहल रहे होंगे। वीडियो न होते हुए भी हमारी बात कुछ यूं शुरू होती है कि मानो हम एक-दूसरे के सुख-दुःख प्रत्यक्ष देख रहे हों। कई बार वह पूछती: 'पापा, आप इतनी सहज और 'एक्यूरेट' बातें कैसे कर लेते हैं?' मैं कहता कि मैं, बस, अपना एंटीना ठीक रखता हूं! और कुछ बातें अपने-आप हो जाती हैं। 'जैसेकि..?' 'जैसेकि बरसों पहले, 22 जुलाई को, मैंने टॉवल से हाथ पौंछे और उसकी चार तह करके बेड के उस ओर रख दिया जहां तुम उछल-कूद कर रहे थे।' ..'और अचानक गिरने पर उसी से मेरा बचाव हो गया था। भौहों के पास हल्का-सा कट का निशान अब भी है।' एक और नया अनुभव भी सामने आया। जब बच्चे विदेश की बजाय स्वदेश में होते हैं तो अपनी ज़मीन से उठी तरंगे अधिक सशक्त और संवेदनशील होती हैं। नन्ही प्रिशा ने तो अभी बोलना भी नही सीखा। फिर वह मेक्सिको रहे या बेंगलोर, बात तो एक ही है। पर नहीं.. अपने देश में होने के अहसास में ही एक अनोखी मिठास है!
Telepathy -- a language without words!
आओ लकीर पीटें..
आओ लकीर पीटें (बुद्धिजीवी बनें!)
सांप तो कभी का जा चुका। आओ हम लकीर ही पीट लें -- कहां से आया, कैसे आया, कहां गया। कोई दूरदर्शी ही किसी संभावित खतरे की बात कहता है। कुछ उस से निपटने की तैयारी भी करते हैं। पर एक बड़ा वर्ग तो कुछ हो जाने पर ही अपनी 'फीड बैक' देता है। यह कौनसा आसान काम है। उसके लिए लकीर पीटनी पड़ती है। ऐसे ही थोड़े कोई बुद्धिजीवी का दर्जा हासिल कर लेता है। ऐसे लोग तो हमें जरा नहीं सुहाते जो कहते हैं "अब लकीर पीटने से क्या फायदा"। ऐसे लोग ही बुद्धिजीवियों की दुकान, सम्मेलन, गोष्ठियां, कॉफी हाउस की 'वर्क शॉप' आदि बंद कराना चाहते हैं। वे भूल जाते हैं कि नवनिर्माण उनकी 'फीड बैक' पर ही तो होगा। एक तरह से सारा संचारतंत्र बुद्धिजीवियों की इस विचारशिला पर ही टिका है। बरसों पहले रेडियो पर एक प्रोग्राम भी आता था "आओ तबसरा करें"। अर्थात जो हो गया उसका लेखा-जोखा रखें। पूर्व चेतावनी देने वाली दूरदर्शिता अब कहां। 'यूरेका' 'यूरेका' चिल्लाता नवीनता का संदेश लिए भला अब कौन भागता है!
आधुनिक आर्किमिडीज़!
Wednesday, 22 August 2018
एक 'शेर'
"पुरुष तुम केवल शंका हो!"
"नारी तुम केवल श्रद्धा हो" की तर्ज़ पर वो कहते हैं "पुरुष तुम केवल शंका हो"!.. जंगल का राजा तक यह पूछ बैठा: "मुझ से पहले भी किसी से प्यार किया है?" शेरनी बोली: "इसी बात पर एक 'शेर' याद आ गया!" एक और शेर की बात पर शंकाग्रस्त शेर जी वापस चले गए!..
Monday, 20 August 2018
SoftMusic
SoftMusic@OperationTheatre
Heart Surgeon Dr. Devi Prasad Shetty of Bengaluru says in an interview: 'Background music is a must in operation theatre whenever I have to perform an operation. It gives me a better concentration. Music goes on in all departments of my hospital.' Patients also feel relaxed by it, he says adding, it saves from other distracting sounds too arising from opening and closing of doors, etc. It is decided by the lead surgeon as which type of music will be there - classical or devotional (no 'kajra-re' please)! A report from British Medical Journal says that 62 to 72 percent surgeons like music during operation. Some other reports too claim that good music gives relief in arthritis, disc problem, high blood pressure, enhances memory and concentration as it activates both sides of the brain and produce endorphins hormone. Music has a long history in the field of surgery in Britain, dating back to 1914, barring playing jazz or sentimental tunes. However, sometimes loudness of music makes communication less effective with nurses and other subordinate staff. Further, liking specific type of music shows your temper type too. Like, Classical music lovers are supposed to be creative and silent type. Dance music fans must be extrovert but not much sober. Rock listeners are usually hard working persons. Preferring Rap are said to be all-rounder!
Operating Tunes : How Music Helps Surgery
Saturday, 18 August 2018
'ब्लड क्लॉट'
बहुत डराता है -- 'ब्लड क्लॉट'!
29 फरवरी को जन्में लोग भी न, साठ साल की उम्र में भी पंद्रह साल के बच्चे जैसी बातें करते हैं। अब मेडिकल इंश्योरेंस का प्रीमियम इस उम्र में पच्चीस हजार सालाना तो बनेगा ही। इसी उलझन में थे कि इतना तो दे नहीं सकते, फिर पांच की बजाय तीन-साढ़े तीन लाख का इंश्योरेंस करा लेते हैं। तभी किसी को देखने अपोलो जाना पड़ गया। एक संबंधी का लिवर ट्रांसप्लांट हुआ था। डोनर उन्हीं की पत्नी थीं जिन्हें एक सप्ताह बाद छुट्टी दी जा रही थी। उनके पति को अभी दस दिन और हस्पताल में रहना होगा। जहां उनकी इस दशा ने मन को झकझोर दिया, वहीं महिला के प्रति मन श्रद्धा से नतमस्तक हो गया। बातों-बातों में पता चला कि कहीं-कहीं की सिफारिश पर वहां दाखिला मिल पाया -- कुल 22 लाख के खर्चे पर। अन्य हस्पतालों में यह 'पैकेज' 35 लाख का सुनने में आया। कहते हैं किसी को विपदा में देखकर मानव मन तत्काल स्वयं की उस स्थिति में कल्पना करने लग जाता है। हम तो अभी 20-25 हजार के प्रीमियम पर ही नापतोल कर रहे थे। अब तो मन ऐसा बावला हुआ कि घर आते ही भगवान की मूर्ति के पांव पकड़ लिए कि -- "दोनों समय गीता पढूंगा.. मैं नहीं कर सकता इतना सब कुछ.. आप ही बचा लो.. मुझे नहीं लेना कोई इंश्योरेंस.. मुझे नहीं स्टेंट्स डलवाने.. कहीं दिल-दिमाग की किसी नस में कोई ब्लड-क्लॉट आ जाए तो आप ही फूंक मार देना!".. भगवान जी ने व्यंग किया: "मेरी एक फूंक से तो सारी सृष्टि हिल जाएगी.. किसी इमरजेंसी में तो लोहानी साहब ही एक फोन कर देंगे.. अब तो फेसबुक-फ्रेंड भी हैं.. कल ही तो इतरा रहा था!" .. जब अंत तक हमने भगवान के चरण नहीं छोड़े तो यह निर्णय हुआ कि भले ही हम 20 हजार प्रीमियम की मेडिकल पॉलिसी न लें, पर जन्माष्टमी पर मंदिर में चढ़ाए अपने खोटे सिक्कों के बदले अपना सारा खोटापन बदल कर ईश्वर के ही सच्चे नाम का आश्रय लेंगे।