महात्मा गांधी जी तक तो सब ने निबंध आदि लिखे हैं। विनोबा भावे और उनके भूदान आंदोलन के बारे में नई पीढ़ी शायद ही जानती हो। (11 सितंबर को उनका जन्म दिवस भी, मालूम नहीं अब कोई मनाता भी है या नहीं।) ना, ना.. शरमाना कैसा.. हमने खुद उन्हें गूगल पर ढूंढा है और अब जन्म दिवस की शुभकामनाएं अर्पित करने में भी देर हो गई है। लगता है, गूगल की उत्पत्ति गांवों की चौपालों से हुई है जहां से देस-परदेस की सारी खबरें और घरेलू नुस्खे तक जन-जन तक पहुंचते थे। आज तो बच्चों को 'चौपाल', 'हुक्का', 'खाट' (चारपाई) जैसे शब्द माफ़िक ही नहीं आते। कहते हैं, ऐसी कोई पोस्ट हमें टैग मत कर देना, सब मज़ाक उड़ाएंगे। बात कुछ ऐसी होती भी जा रही है। अपने घर में तो कहीं भी खूंटी पर तौलिया 'लटका' लो। किसी और के घर तो 'टॉवल' सही जगह ही 'टांगना' पड़ेगा। ऐसे ही एक रोज़ हम किसी के घर इम्पोर्टेड टी-सेट की मधुर खनखनाहट से खुश हो रहे थे--पर चाय आ गई स्टील के गिलास में। बातों-बातों में हमने, बस, इतना पूछा था, 'अपना अंगोछा कहां लटकाएं?' शायद परिवेश भी शब्दों को रूप बदलने पर विवश कर देता है। बचपन में रेल के डिब्बों में Lavatory के साथ 'संडास' शब्द देख कर तो हम भी डर जाते थे। आज के प्रसाधन-कक्ष की तो बात ही निराली है!..