Friday, 29 March 2019

प्लास्टिक के लोग!

प्लास्टिक के लोग!

पहले लोग एक-दूसरे को
शुभकामनाओं सहित
फूलों के गुलदस्ते भेजते थे
(कुछ अब भी गुलाब के फूल की
एकाध टहनी भेजते हैं)
फिर नकली प्लास्टिक के
फूलों का ज़माना आया
और चला भी गया
अब डिजिटल फूल
हंसती इठलाती स्माइलियां
सरल सर्वत्र उपलब्ध हैं
मुफ्त ..
पर अब लोग व
मानदंड बदल गए --
अंगुली टच-स्क्रीन से ही
परहेज करनी लगी ..
कइयों के व्यक्तित्व को ही
यह सब अखरने लगा
उन्हें खुद को ही
प्लास्टिक मानव कहना
भाने लगा!

-विजय के भटनागर, 'परिक्रमा' ब्लॉग स्पॉट.कॉम

Thursday, 8 November 2018

सहृदयता

Mine 8 Nov 2017 post:

सहृदयता ..

अशोकवाटिका में सीताजी को कष्ट सहते देख देवलोक में देवी पार्वती को अपार व्यथा होती और वह शंकर भगवान से इसके निवारण को कहतीं। उनकी यह व्यथा सीताजी के प्रति सहृदयता है। अर्थात सहृदयता एक दैवीय गुण है। वर्तमान समय में भी कुछ लोग सहृदयता सम्पन्न हैं व दूसरों के दुःख में साथ देने का प्रयास करते रहते हैं। नोबल शांति पुरस्कार से सम्मानित कैलाश सत्यार्थी ऐसे ही एक सहृदय भारतीय हैं जिनका जीवन बच्चों का जीवन बेहतर बनाने लिए समर्पित है जिसके लिए वह विश्व के 150 देशों के 83000 से अधिक बच्चों के लिए कार्य कर चुके हैं। कुछ अन्य लोग भी अपने क्षेत्र में इसी सहृदयता से कार्य करते रहते हैं। ऐसे व्यक्ति निश्चय ही औरों को शीतल छाया देने वाले विशाल वृक्ष की तरह हैं। दूसरी ओर, बेल अथवा कमज़ोर लताओं की यह प्रवृति अथवा विवशता है कि वे अपने निकटतम पेड़ के तने से लिपट जाती हैं।। अपने कार्य के प्रति समर्पित रहते हुए अपने कार्यक्षेत्र व अपने असंख्य कर्मचारियों के जीवन में परिवर्तन लाने का भाव श्री अश्वनी लोहानी के व्यक्तित्व में भी सहज देखा जा सकता है। उनकी कोई पोस्ट किसी भी विषय अथवा कार्य से संबंधित क्यों न हो, अनेकानेक कर्मचारी अपनी व्यक्तिगत समस्याएं उनके सम्मुख ले आते हैं। एक साधारण कर्मचारी अपने सीएमडी को अपनी पहुंच की सीमा में देखकर भावविभोर हो जाता है। यह 'अनौपचारिक मिलन'  उनकी सहृदयता ही है। औपचारिक रूप में (अंग्रेजों के समय के) 'थ्रू प्रॉपर चैनल' नियमानुसार न चलना तो स्वयं ही अनुशासनात्मक कार्रवाई के अंर्तगत आता है। शायद आज भी एक कर्मचारी अपनी कोई शिकायत एक-दो स्तर ऊपर तक ही कर सकता है। विन्रम निवेदन करूंगा, कोई भी कर्मचारी अपनी किसी शिकायत अथवा आवेदन आदि की प्रितिलिपि सीएमडी को भी सूचनार्थ भेजने को स्वतंत्र होना चाहिए ताकि एक न्यनतम अवधि तक निचले स्तर पर कोई कार्यवाही न होने पर वह उनसे मिल सके।। अंत में, जैसा व्यवहार हम औरों से चाहते हैं, हमें भी अपने संपर्क में आए लोगों से करना चाहिए। यदि हम सब मात्र अपने एक-एक निकटवर्ती घर के किसी दुःख में सहायक होने लगें तो स्वयं ही एक खुशनुमा समाज बन जाएगा!

Wednesday, 26 September 2018

उलटा इंजन!

बचपन से ही हमें रेलगाड़ी बहुत अच्छी लगती है। लगता है, रंग-बिरंगा एक पूरा शहर दौड़ रहा है और साथ-साथ सब चीज़ें घूम रही हैं! इंजन के साथ बस दो-चार डिब्बे तो हमें एक खुशनुमा परिवार का ही अहसास कराते रहे हैं। और अकेले इंजन को दौड़ते देख तो हमें लगता था, फटाफट अपने परिवार को लेने जा रहा है या ड्यूटी ऑफ कर घर भाग रहा है! रह गया उलटा इंजन -- इसने हमें बचपन से ही परेशान कर रखा है। उलटा इंजन जाते देख कर लगता है.. यह कुछ गड़बड़ करके आ रहा है..शायद किसी को कहीं छोड़ कर, किसी और से जुड़ने जा रहा है। कुछ बड़े हुए तो लगा कि जैसे यह किसी कोर्ट-केस से छूट कर भाग रहा है। धीरे-धीरे तो यह बात मन में पक्की हो गई कि यह 'डिवोर्स' देकर उलटे पांव भाग रहा है। और उस दिन तो उलटा इंजन देखने के अपशकुन पर मुहर ही लग गई जब एक बंद रेलवे क्रासिंग पर कार रोक कर हमनें एक अख़बार लिया। अभी करिश्मा कपूर के डिवोर्स की खबर पढ़ ही रहे थे कि सिटी मारता एक उलटा इंजन भाग गया!.. पंडित डॉट कॉम ने तो इसके उपाय के भी 1100 लेने शुरू कर दिए हैं। हम दोनों तो उलटा इंजन देखने पर, उस दिन बस कोई पिक्चर देख आते हैं!

Wednesday, 19 September 2018

शब्द और परिवेश

महात्मा गांधी जी तक तो सब ने निबंध आदि लिखे हैं। विनोबा भावे और उनके भूदान आंदोलन के बारे में नई पीढ़ी शायद ही जानती हो। (11 सितंबर को उनका जन्म दिवस भी, मालूम नहीं अब कोई मनाता भी है या नहीं।) ना, ना.. शरमाना कैसा.. हमने खुद उन्हें गूगल पर ढूंढा है और अब जन्म दिवस की शुभकामनाएं अर्पित करने में भी देर हो गई है। लगता है, गूगल की उत्पत्ति गांवों की चौपालों से हुई है जहां से देस-परदेस की सारी खबरें और घरेलू नुस्खे तक जन-जन तक पहुंचते थे। आज तो बच्चों को 'चौपाल', 'हुक्का', 'खाट' (चारपाई) जैसे शब्द माफ़िक ही नहीं आते। कहते हैं, ऐसी कोई पोस्ट हमें टैग मत कर देना, सब मज़ाक उड़ाएंगे। बात कुछ ऐसी होती भी जा रही है। अपने घर में तो कहीं भी खूंटी पर तौलिया 'लटका' लो। किसी और के घर तो 'टॉवल' सही जगह ही 'टांगना' पड़ेगा। ऐसे ही एक रोज़ हम किसी के घर इम्पोर्टेड टी-सेट की मधुर खनखनाहट से खुश हो रहे थे--पर चाय आ गई स्टील के गिलास में। बातों-बातों में हमने, बस, इतना पूछा था, 'अपना अंगोछा कहां लटकाएं?' शायद परिवेश भी शब्दों को रूप बदलने पर विवश कर देता है। बचपन में रेल के डिब्बों में Lavatory के साथ 'संडास' शब्द देख कर तो हम भी डर जाते थे। आज के प्रसाधन-कक्ष की तो बात ही निराली है!..   

Monday, 3 September 2018

अपना-अपना एंटीना!

पचास साल पहले रेडियो सीलोन पर बुधवार रात सात से आठ बजे अमीन सयानी का प्रोग्राम 'बिनाका गीतमाला' सुनने के लिए ट्रांजिस्टर का एंटीना कई बार ऊपर-नीचे करने पर ही कुछ ठीक आवाज़ आती थी। सबको बड़ी प्रतीक्षा रहती थी कि कौनसा गाना किस पायदान पर है और टॉप किसने किया। अब वीकेंड पर सब अपने वाई-फ़ाई सिस्टम दुरूस्त करने में लगे रहते हैं कि विदेश में रह रहे बच्चों से आराम से वीडियो-चैट हो जाए। यह सब निपट जाने पर, बेटी मुझे मोबाइल पर कॉल करती है कि इन सबसे बेखबर 'पापा जी' पार्क में टहल रहे होंगे। वीडियो न होते हुए भी हमारी बात कुछ यूं शुरू होती है कि मानो हम एक-दूसरे के सुख-दुःख प्रत्यक्ष देख रहे हों। कई बार वह पूछती: 'पापा, आप इतनी सहज और 'एक्यूरेट' बातें कैसे कर लेते हैं?' मैं कहता कि मैं, बस, अपना एंटीना ठीक रखता हूं! और कुछ बातें अपने-आप हो जाती हैं। 'जैसेकि..?'  'जैसेकि बरसों पहले, 22 जुलाई को, मैंने टॉवल से हाथ पौंछे और उसकी चार तह करके बेड के उस ओर रख दिया जहां तुम उछल-कूद कर रहे थे।' ..'और अचानक गिरने पर उसी से मेरा बचाव हो गया था। भौहों के पास हल्का-सा कट का निशान अब भी है।'  एक और नया अनुभव भी सामने आया। जब बच्चे विदेश की बजाय स्वदेश में होते हैं तो अपनी ज़मीन से उठी तरंगे अधिक सशक्त और संवेदनशील होती हैं। नन्ही प्रिशा ने तो अभी बोलना भी नही सीखा। फिर वह मेक्सिको रहे या बेंगलोर, बात तो एक ही है। पर नहीं.. अपने देश में होने के अहसास में ही एक अनोखी मिठास है!

Telepathy -- a language without words!

आओ लकीर पीटें..

आओ लकीर पीटें (बुद्धिजीवी बनें!)

सांप तो कभी का जा चुका। आओ हम लकीर ही पीट लें -- कहां से आया, कैसे आया, कहां गया। कोई दूरदर्शी ही किसी संभावित खतरे की बात कहता है। कुछ उस से निपटने की तैयारी भी करते हैं। पर एक बड़ा वर्ग तो कुछ हो जाने पर ही अपनी 'फीड बैक' देता है। यह कौनसा आसान काम है। उसके लिए लकीर पीटनी पड़ती है। ऐसे ही थोड़े कोई बुद्धिजीवी का दर्जा हासिल कर लेता है। ऐसे लोग तो हमें जरा नहीं सुहाते जो कहते हैं "अब लकीर पीटने से क्या फायदा"। ऐसे लोग ही बुद्धिजीवियों की दुकान, सम्मेलन, गोष्ठियां, कॉफी हाउस की 'वर्क शॉप' आदि बंद कराना चाहते हैं। वे भूल जाते हैं कि नवनिर्माण उनकी 'फीड बैक' पर ही तो होगा। एक तरह से सारा संचारतंत्र बुद्धिजीवियों की इस विचारशिला पर ही टिका है। बरसों पहले रेडियो पर एक प्रोग्राम भी आता था "आओ तबसरा करें"। अर्थात जो हो गया उसका लेखा-जोखा रखें। पूर्व चेतावनी देने वाली दूरदर्शिता अब कहां। 'यूरेका' 'यूरेका' चिल्लाता नवीनता का संदेश लिए भला अब कौन भागता है!

                    आधुनिक आर्किमिडीज़!

Wednesday, 22 August 2018

एक 'शेर'

"पुरुष तुम केवल शंका हो!"

"नारी तुम केवल श्रद्धा हो" की तर्ज़ पर वो कहते हैं "पुरुष तुम केवल शंका हो"!.. जंगल का राजा तक यह पूछ बैठा: "मुझ से पहले भी किसी से प्यार किया है?" शेरनी बोली: "इसी बात पर एक 'शेर' याद आ गया!" एक और शेर की बात पर शंकाग्रस्त शेर जी वापस चले गए!..