Monday, 3 April 2017

मुआवज़ा!

..हमें ठीक से याद नहीं कि कब रिटायर हुए थे या वी.आर.एस. लिया था। जन्म की तारीख 29 फरवरी का साल भी ठीक याद नहीं कि 1952 था या 1956? ..नहीं-नहीं, अल्ज़ाइमर्स नहीं.. बस, किसी के ऐसे सवालों पर खांसी आ जाती है; फिर आगे जवाब मैडम दे देती हैं। हमें तो इतना याद है कि रिटायरमेंट के दो सालों तक हमें अपनी बालकनी में भी आने की मनाही थी। फोन पर भी 'नाईट ड्यूटी चल रही है' कि बात होती थी। दरअसल, मैडम को हमारे बारे में किसी का यह पूछना बिल्कुल गवारा नहीं था कि 'घर पड़े रहते हैं?' ..हम भी दरवाज़े की ओट से सामने वाले 70 वर्षीय पड़ोसी को लंच-बॉक्स थामे काम पर जाते देखते और ग्लानि से भर कर फिर पड़ जाते। कितना इतरा कर हम कहते थे कि रिटायरमेंट के बाद कुछ न भी कर सके तो अपना लिखने का हुनर तो है ही। ..सन सत्तर से लिखते आ रहे हैं। अब भी खुशवंत सिंह जी के कई पत्र रखे हुए हैं। किसी भी पोस्ट ऑफिस के बाहर बैठ गए तो खत लिखवाने वालों की लाइन लग जाएगी। हेड पोस्ट ऑफिस की तो बात ही क्या है। संचार-क्रांति ने ही हमें कहीं का नहीं छोड़ा। मोदी जी के पोर्टल पर मुआवज़े की मांग भी की हुई है।

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