क्षमा करें, आज वो पुरानी क़लम हाथ में आ गई जिस से लुक-छुप कर चिट्ठियां लिखते, छुपाते; बच्चों को टॉफियां भी खिलाते और डर कर भी रहते; कोई जवाब आने पर फिर उसे छुपाते फिरते। मोबाइल तब था नहीं। (होता तो, सच, पूजा करते!) उन दिनों 9 बजे एक मिनट का सायरन बजता था। बस, यही संकेत था कि उस एक मिनट में, उधर से गुज़रने पर, चिट्ठी का लेना-देना, दर्शन-वर्शन कर लो। कुछ आस-पड़ोस के लोग शायद सायरन बजने पर ही दहलीज़ पर बैठकर दातुन करते थे और हमें जब-तब यू-टर्न लेना पड़ता था। अंततः हमने एक कोड-भाषा ही बना डाली। मसलन, ए के स्थान पर बी, बी के लिए सी.. वाई के लिए ज़ेड लिखना। थर्ड पार्टी को गुमराह करने के लिए, एक्स कहीं भी लिख सकते थे। पढ़ने वाला इसे बैक गियर में पढ़ेगा (बी की जगह ए)। अर्थात, NPOEBZ LBUJ QBUBOH = MONDAY KATI PATANG ..फिर क्या -- लोगों की तो चिट्ठिया हीं पकड़ी जाती हैं, हमारा तो प्रॉस्पेक्टस ही पकड़ा गया। कट गई पतंग!..
(आजकल तो पता ही नहीं चलता, चादर ओढ़ कर साहबज़ादे सो रहे हैं, चैट कर रहे हैं या दिव्य-दर्शन कर रहे हैं!)
Wednesday, 2 May 2018
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