Saturday, 16 June 2018

मुंहफट!

..वो तो रिक्शा खाली थी.. नहीं तो बात पहुंच गई थी थाने.. और अब जा पहुंची मंदिर!.. बस, घर आने से पहले मैडम को कुछ दूर कार चलाने की सूझी। स्टीयरिंग थामते ही चिपका दी सामने रिक्शा में। रिक्शा चालक बेचारा एक झटके से पीछे वाली सीट पर जा बैठा। उस पर भी मैडम का जवाब: "भैया, देख कर चला करो!" लेकिन इस बात का हमारे दिल पर इतना गहरा असर हुआ कि बेटी को जन्मदिन पर छोटी-मोटी कार दिलाने की जो सोच रहे थे, वो उसकी शादी तक पोस्टपोन कर दी  कि दिल्ली की भीड़भाड़ में तो दिल नहीं मानता। रिक्शा वाली टक्कर के बाद मंदिर भी जाना शुरू तो कर दिया था पर वहां के कायदे-कानून से ज़्यादा वाकिफ नहीं थे। जैसे क्लास में बच्चे बीच-बीच में मास्टर जी से कुछ पूछते रहते हैं, वैसे ही पंडित जी के प्रवचन के दौरान हम हाथ खड़ा कर देते थे। नज़र मिलते ही पंडित जी अपने होठों पर अंगुली रख कर हमें चुप बैठे रहने का संकेत देते रहते थे। एक बार तो उन्होंने हमें 'मुंहफट' ही कह दिया था! बस, इतना पूछा था: 'पंडितजी, आपको श्राद्ध के दिनों का ज़्यादा इंतज़ार रहता है या नवरात्रों का?' सालों बाद एक दिन प्रवचन के दौरान फिर हाथ खड़ा करने से हम खुद को नहीं रोक पाए जब वह बोल रहे थे: 'बेटी-दामाद को तो कितना भी देते रहो, पेट ही नहीं भरता।' ..बस, हम बोल पड़े:  '..पर हमारी बेटी तो हमसे पहले से ही 'पेंडिंग' कार भी नही ले रही। दामाद जी भी कहते हैं कि अपनी किसी ज़रूरत के लिए पैसा रखो। अपनी बेटी के रूप में आपने सब दे दिया!' पंडित जी कहने लगे, 'संकल्प की हुई चीज तो देनी पड़ेगी, नहीं तो नरक-वरक..'  डर के मारे हमने पास जाकर कोई उपाय पूछा कि संकल्प की हुई चीज़ किसी और को दे सकते हैं? पंडित जी ने बाद में मिलने को बोला है!..

Wednesday, 13 June 2018

क्या यार!..

पहले तो मैं उनके पीछे
जा न सका,
फिर
साहस जुटा कर भागा --
वो रुके भी..
पर तब मैं
रुक न सका
और सीधा
घर आकर ठहरा!

-- विजय के भटनागर
       22.4.1981

Saturday, 2 June 2018

बच्चे मन के सच्चे!

माता-पिता के साथ देखी पहली पिक्चर: "माँ-बाप" (1958): कुछ याद नहीं।। "जिस देश में गंगा बहती है" (1960): कुछ 'तस्वीरें' याद हैं।। "दो आंखें बारह हाथ": यह एकतारा याद है, और "चलती गाड़ी का नाम' (1961):  बच्चे चालाकी नहीं समझते - मैं समझता था "चलती का नाम गाड़ी" गलती से लिखा गया है।। "आरती" (1962): सब पात्रों को भाई-बहन ही समझता था।। "जब-जब फूल खिले" (1965): मन में किशोर अवस्था के फूल खिलने लगे थे!.. और

धीरे ....

धीरे ....

"राम तेरी गंगा मैली हो गई"!..

दीवार

--"सखि, कोई माथुर साहब आए, बोले --
न तो मैं तुम्हे देख रहा हूँ, न तुम्हारे इन उपलों को;
मैं तो देख रहा हूँ, तुम्हारी उपले पाथने की दीवार।
मेरी हालत भी इस दीवार जैसी है --
कोई भी आकर एक उपला-सा चेप जाता है
-- माथुर साहब, सारी गड़बड़ियां
आपकी शिफ्ट में ही क्यों होती हैं?!"

(1997 की इस हास्य-कविता के सभी पात्र, नाम एवं घटनाएं काल्पनिक हैं। किसी वर्तमान अथवा रिटायर्ड शिफ्ट-इंचार्ज से दर्द-ए-दिल मिल जाना महज़ इत्तफाक ही समझें!)

- विजय के भटनागर