--"सखि, कोई माथुर साहब आए, बोले --
न तो मैं तुम्हे देख रहा हूँ, न तुम्हारे इन उपलों को;
मैं तो देख रहा हूँ, तुम्हारी उपले पाथने की दीवार।
मेरी हालत भी इस दीवार जैसी है --
कोई भी आकर एक उपला-सा चेप जाता है
-- माथुर साहब, सारी गड़बड़ियां
आपकी शिफ्ट में ही क्यों होती हैं?!"
(1997 की इस हास्य-कविता के सभी पात्र, नाम एवं घटनाएं काल्पनिक हैं। किसी वर्तमान अथवा रिटायर्ड शिफ्ट-इंचार्ज से दर्द-ए-दिल मिल जाना महज़ इत्तफाक ही समझें!)
- विजय के भटनागर
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