'झोला चुक'
सरकारी नौकरी में छोटे-बाबू, बड़े-बाबू (LDC/UDC) की तरह, मेरी पहली नौकरी में इन्हें जूनियर/सीनियर क्लर्क कहा जाता था। सालाना 6/- रुपए की इन्क्रीमेंट लेते 15 साल बाद बड़े बाबू बनने की उम्मीद होती थी; और फिर उसी पायदान पर अधिकांश रिटायर हो जाते थे। जॉइनिंग के दिन कमरे में पहला कदम रखते ही कुछ ऐसा स्वागत हुआ था --'लो एक और पंछी आ गया पिंजरे में!' 15-20 साल से एक ही जगह रह रहे वे लोग कह तो ठीक ही रहे थे। 'आउट ऑफ द वे' प्रमोशन पाए अपने किसी क्लीग को वे बातों-बातों में 'झोला चुक' कहते थे। जान-पहचान बढ़ने पर एक दिन 'झोला-चुक' का मतलब पूछ ही लिया। '..अरे, वही, जो महाराजा का गाउन उठाते हुए चलते रहते है.. अफसरों के दुमछल्ले!' .. करीब 35 साल बाद अभी कुछ दिन पहले ही मैंने उस व्यक्ति का धन्यवाद किया जिनके उपहास स्वरूप मैंने वह नौकरी छोड़ने की ठान ली थी। अपना ओहदा बताने पर वह 'ही-ही' कर बोले थे --'एक तो क्लर्क, वो भी जूनियर!'
No comments:
Post a Comment