Saturday, 8 July 2017

एक दिन ऐसे ही!..

एक दिन ऐसे ही सहृदय बनते हैं -- दिमाग़ को कहीं सुरक्षित जगह रख कर, बस, दिल से काम लेते हैं!.. जैसे राम-कथा में कई जगह सीता जी की पीड़ा को देखकर, पार्वती जी उनकी मदद को व्याकुल हो जाती थीं तो भगवान शिव उन्हें समझाते कि जगत कल्याण के लिए यह उनकी लीला है.. आप अधीर न हों।  किन्तु अशोक वाटिका के नकारात्मक वातावरण में सीता जी की अतिश्य पीड़ा देखकर तो वह स्वयं को नहीं रोक सकीं थीं। अपने स्पर्श मात्र से सीता जी को वह उनकी दिव्यता का बोध करातीं कि वह इतना दुःखी न हों! उनके जाने के बाद, मानवी रूप में सीता जी उनका आगमन भूल जातीं, किन्तु उन्हें  स्वयं में एक नई स्फूर्ति तथा सकारात्मक परिवर्तन अनुभव होता। उनके सानिध्य में रह कर राक्षसनियां भी सुधरने लगी थीं। एक संदर्भ में तो सीता जी को साधारण टहनी से बनाए अभिमंत्रित तीर चलाकर एक दैत्य को मारते दिखाया गया है जो रावण द्वारा सीता जी के लिए भेजे गए विष के बिखर जाने से प्रकट हो गया था तथा अन्य राक्षसनियां भी तब सीता जी की शरण में आ गई थीं। .. बस, इतनी जल्दी पेड़ पर लटकाया अपना दिमाग़ उतार लाए, यह पूछने कि ऐसा कहां लिखा है?    -- बहुत कठिन है रे दिल की डगरिया!..        (दिल से)

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