हमारे जमाने के प्रशासक (CMD) साल के मध्य एक ऐसा संक्षिप्त सर्कुलर निकाला करते थे: "सुधर जाओ। जड़ें खोदी जा रही हैं।" मन-ही-मन कर्मचारी कानों को हाथ लगा पिछले छह महीनों की किसी गलती से बचा लेने की भगवान से प्रार्थना करते रहते थे और आगे के छह महीने तो जान हथेली पर रख कर काम करते ही थे। हमारा एक दोस्त तो बदहवास-सा हो जाता था जो जब-तब इतरा कर कहता था: "मैं इस महकमे में अपनी पांचवीं पीढ़ी से हूं!" जड़ें खोदने वाली बात को हर कोई अपने-अपने तौर पर लेता था। एक बार पूछा तो भड़क गया: "तुम क्या जानो भाई-भतीजावाद; तुम तो 'नेपोटिज़्म' के उलटे हो।" हम यही सोचकर डरे-डरे घूमते कि जब यह इतना डर रहा है, तो कहीं-न-कहीं तो हम भी 'नेपोटिज़्म' से जुड़े ही हैं, चाहे उलटे तौर पर ही सही। बड़ी मुश्किल में डाल दिया उसने। समस्या हमारी, पूछते औरों से थे: "भैया, यह बता दो कि हम 'नेपोटिज़्म' के उलटे कैसे हैं?" साल के अंत में जब लोगों का डर कुछ कम हुआ तो हमने ठान ही लिया कि आज उससे पूछ कर ही जाएंगे कि हम 'नेपोटिज़्म' के उलटे कैसे हैं। वह बोला: "तुम्हारे पिताजी रेलवे में टिकट बाबू थे? (थे!) बड़े भाई साहब रोडवेज़ में थे? (थे!) तुमने डी टी सी पकड़ ली? (पकड़ ली!) बेटा मेट्रो में हाथ-पांव मार रहा है? (हां!) ..अरे! यही तो उलटफेर है!" अब भी समझ नहीं आया कि वह हमारी तारीफ कर है या व्यंग कर रहा है। बहरहाल, शायद डरना और डराना दोनों ज़रूरी है!
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