Sunday, 6 August 2017

अधूरा मुहावरा!

एक बार बचपन में हम माँ का लाड़-प्यार देखने को दो-चार घंटे को गायब हो गए थे। बहुत ढूंढ़ेर मचने पर जब प्रकट हुए तो माँ ने "मेरा लाल, मेरा पीला" आदि कहकर बहुत लाड़ किया कि कहां चला गया था; मेरी तो जान ही निकल गई थी! हमने भी सच-सच बता दिया कि एक मुहावरा पढ़ा था जो असल में देखना था कि बेटे के दूर जाने पर माँ क्या सचमुच बहुत रोती है..! तब तो कपडे धोने की थापी से हमारी वो धुलाई हुई कि, कम्बख्त, पूरा मुहावरा तो पढ़ जाता: 'पहले माँ रोती बहुत है, फिर धोती बहुत है।' अभी मरहम-पट्टी शुरू ही हुई थी कि आवाज़ आई: अभी रुक जाओ, मैं भी जरा निपट लूं इस छोरे से!..

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