रिटायरमेंट के बाद पेंशन न होने पर ऐसी जली-कटी तो सुननी ही पड़ेंगी.. "काम के न काज के.. बताओ, सारी उम्र एक बेटे को भी अपनी कंपनी में नहीं घुसा सके!"..बस, ऐसे ही दिन कट रहे थे। कोई छोटी-मोटी तकलीफ होने पर घरेलू टोटकों से ही अपना इलाज कर खुश हो लेते थे कि चलो, डॉक्टर के दो-चार सौ बचा लिए -- 'मनी सेव्ड, मनी अर्नड'! साल के आखिर में यही सोच कर खुश हो लेते थे कि कोई हार्ट-वार्ट की बड़ी तकलीफ नहीं हुई.. चलो, एक-दो लाख बच गए!.. एक बार मैडम ने तबियत साफ कर दी, "तुम क्या समझ रहे हो, कुछ हो गया तो हम तुम्हें अपोलो ले जाएंगे?.. अपना जोड़-तोड़ कर कोई मेडिकल इंशोरेंस ले लो।" तब से बड़ी खर्चीली बीमारियों के भी घरेलू नुस्खें लिख रहे हैं। दफ्तर में भी हम ऐसे ही 'लो प्रोफाइल' थे। कई हमें 'राम जी की गाय' कहते तो कई कहते, "यह नेपोटिज़्म के उलटे हैं!" कोई सिफारिश थी नहीं। किसी कम्पटीशन में भी नहीं बैठते थे। बस, सब राम भरोसे!.. अब 18 अगस्त से राहू-केतु ने अपनी चाल क्या बदली, हमारी चाल में भी परिवर्तन आ गया। कंधे उचका कर चलने लगे। पार्क में चक्कर लगाते देख कई पूछते भी, "क्या किसी शेर से दोस्ती हो गई है?" बस, जैसे किसी ने आंखों पर रंगीन चश्मा लगा दिया हो -- सब हरा-भरा दिखाई देता था। कहां हम रितिक रोशन की गलत मेल आई-डी पर ही लिखते रहते थे कि अपनी बायोग्राफी के कुछ पेज हमसे भी लिखवा लो; अब खुद अपने सीएमडी साहब का फोन आने का इंतजार रहता है। बताइए, उनका इतना बड़ा सोशल सर्कल.. समझो, अपनी तो निकल पड़ी! एक बार तो पत्नीजी को भी सुना दिया, "तो तुम हमें सरकारी हस्पताल में पटकने जा रही थीं; अब देखो, उनके एक ही फोन से..!" पंडितजी ने सुना तो कहने लगे, खुशी के मौके पर कथा करा लो। हम तो, सच, फूले नहीं समाए जब कथा समाप्ति पर पंडितजी बोले, "..जैसे इनके दिन फिरे, भगवान सबके दिन फेरियो!" ..न, न.. घमंड तो अब भी हम में जरा नहीं आया था। अकड़ी गर्दन से ही सही, भजन वही गुनगुनाते रहते हैं: "करते हो तुम कन्हैया, मेरा नाम हो रहा है..!" अलबत्ता, कभी-कभार यह ख्याल मन में जरूर आ जाता है -- क्यों न बिगड़े नेताजी का बेटा जब हम ही इतना उछल रहे हैं.. सीएमडी साहब ने अभी फेसबुक फ्रेंडशिप ही मंजूर की है!..
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