सीता-राम के विवाह से पूर्व एक रोज़ राजा जनक के दरबार में एक भोज का आयोजन था। विविध पकवान परोसे जा रहे थे। जैसे ही राजा जनक ने खीर खाना आरम्भ किया, सीता जी की नज़र उनके खीर के पात्र में एक तिनके पर पड़ी। भरी सभा में कुछ कहना उन्हें उचित नहीं लगा और न ही वह उसे अनदेखा कर सकती थीं। तभी उन्होंने एकटक उस तृण को देखा। अगले ही क्षण वह जल कर खीर के पात्र के एक किनारे चिपक गया। राजा जनक ने यह सब होते हुए देख लिया। सभा समाप्ति पर उन्होंने अपनी पुत्री से कहा, "मैं जान गया कि आप भगवती स्वरूपा हैं; किंतु कभी अपनी शक्ति का प्रयोग किसी के अहित में नहीं करना।" अशोक वाटिका में रावण के आने पर सीता जी का हाथ में एक तृण पकड़े रहना अपने पिता की इसी बात को स्मरण रखना था अन्यथा रामकथा ही बदल जाती। कुछ लोगों का इसे डूबते को तिनके का सहारा कहना नितांत हास्यास्पद है। सीता जी को स्पर्श कर पाना ही असंभव था; फिर उनका हरण कैसे हुआ। इस संबंध में भी एक कथा का प्रसंग है। वनवास के समय एक रोज़ लक्ष्मण जी की अनुपस्थिति में श्री राम ने सीता जी को अग्निदेव के संरक्षण में सौंपा और तत्पश्चात वह उनका प्रतिबिंब मात्र रहीं। रावणवध के पश्चात तथाकथित अग्नि परीक्षा का आशय भी अग्निदेव से सीता जी को वापस लेना था। लक्ष्मण जी का क्रोध देखकर उस समय ही श्री राम ने उन्हें वास्तविकता से अवगत कराया था।
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