"नाना जी, मैं छोटी 'सीएमडी' लग रही हूं न?" लोहानी साहब जैसा चश्मा लगा कर मेरी नातिन ने पूछा। मैं समझ गया, मेरा आधा-अधूरा ब्लॉग पढ़ कर अब तो यह छुटकी सवालों की ऐसी झड़ी लगा देगी कि एक कहानी ही बन जाएगी। -- नाना जी, क्या सीएमडी के छोटे-छोटे पंख होते हैं.. फिर वह इतने सारे जहाजों को कैसे देखते होंगे.. क्या वह उड़ते ही रहते हैं.. जमीन पर उनके पांव नही टिकते.. फिर तो वह किसी से मिलते भी नहीं होंगे.. बस, घर से जहाज में बैठे.. इधर-उधर घूमे, मतलब उड़े, और शाम को घर की छत पर उतर गए!.. फिर लोहानी साहब आपको कहां मिले.. वह "उड़ने वाले" सीएमडी क्यों नही थे.. क्या वह "माई फ्रेंड गणेशा" की तरह किसी गुफा में रहते थे.. और किसी के भी बुलाने पर झट आ जाते थे.. किसी को देखने हॉस्पिटल भी चले जाते थे.. सबकी मदद को तैयार रहते थे.. मैंने आपका मोबाइल देखा -- वो तो आपके मैसेज का जवाब भी देते थे.. "वह जमीन से और एक आम आदमी से जुड़े थे" इसका क्या मतलब हुआ?..आपको अपने कई सीएमडी के नाम भी याद नहीं.. फिर लोहानी साहब को क्यों सब लोग इतना प्यार करते हैं.. "पहाड़ पर चढ़ने वाला झुक कर चलता है, नीचे उतरने वाला अकड़ कर चलता है.." यह भी समझ नहीं आया.. अच्छा, अब मैं समझी-- "आपके वाले" सीएमडी "माई फ्रेंड गणेशा" की तरह थे--लाखों में एक!
("Touched I am!" Mr. Ashwani Lohani comments)
No comments:
Post a Comment