हमारा पड़ोसी "कार मैकेनिक दिलेर" - "सीएमडी" बुलाने पर खुश हो जाता। रोज़ाना एक दिन पुराना हिंदी का अखबार लेने आता, शाम को वापस कर जाता। बारह साल पहले मारुति 800 लेने हम उसीको साथ ले गए थे। वह ही उसकी सर्विसिंग आदि करता। 99,999 की मीटर रीडिंग की तो उसने फोटो भी ली थी। चारों व्हील और कई अंजर-पंजर इस अवधि में उसने बदले। कई बार टेम्परेचर की रीडिंग अचानक बढ़ जाने पर मैं उसे अब गाड़ी चलाते डर लगने की बात कहता। वह हर बार कहता, चिंता न करो, आपके लौटते ही देखता हूं। बस, दूसरे कार मैकेनिक दिलावर के पास मत चले जाना। मेरा काम है गाड़ी में जान फूंकना, उसका काम है, गाड़ी बिकवाना। सब उसे "सीएमडी-सेल्स" कहते हैं। कुछ दिन बाद एयरपोर्ट से लौटते, धौला-कुआं के पास छह लेन ट्रैफिक में कार रुक गई। बड़ा अटपटा लगा जब स्टार्ट ही न हो। दिलेर को फोन किया। उसने कहा, बोनट खोलकर पहली पाइप के दोंनो सिरे अदल-बदल कर, इधर का उधर, फिट कर दो। ऐसा करते ही कार स्टार्ट हो गई तो जान में जान आई। लेकिन घर पहुंचने से 4-5 किलोमीटर पहले ही फिर रुक गई। दिसम्बर का महीना था। अपने स्कूटर पर कंबल ओढ़े दिलेर वहां पहुंचा और फिर कार स्टार्ट की। यह बात दिलावर तक भी पहुंची। बोला, "कब तक घसीटोगे -- बावन हज़ार एक.. दो.. चलो, पचपन हज़ार!" अगले दो दिन छुट्टी थी, सोचा, पहले दिलेर से ही बात करेंगे। पर वह तो आधा इंजिन ही खोल चुका था। "अबकि बार अगर गाड़ी रास्ते में रुक जाए तो सीएमडी मत कहना!" ..दूसरे कार मैकेनिक "सीएमडी-एस" (सेल्स) की तर्ज पर अब दिलेर ने भी अपनी नेम-प्लेट बनवा ली है -- "सीएमडी-आर" (रिवाइव)। अखबार लौटाने आने पर कई बार वह अपने कमेंट्स भी कर जाता है: "कार हो या जहाज, सीएमडी जान फूंकने वाला होना चाहिए। आपके तो अच्छे दिन आते-आते रह गए.. बुला लिया था जान फूंकने वाला सीएमडी.. चल दिए बेचने!"
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