Tuesday, 13 February 2018

पता ही नहीं चलता..

पता ही नहीं चलता, कब बातें यादें बन जाती हैं!.. अभी की तो बात है, जब तुम्हारे कमरे में पांव रखते ही लगा था कि तुम इतनी बड़ी कब हो गयीं.. कमरे की उस दूधिया रोशनी का एक टुकड़ा मानो मेरे साथ आ गया था जो जब-तब मेरे मन को प्रकाशित करता रहता है और उस उज्ज्वल चमक में मुझे तुम्हारे माथे पर एक ताज दिखाई देता है!

..बार-बार हो रही किसी चुभन को रोकने के लिए जब मैंने एक बार तुम्हारा हाथ रोक दिया था, तो मुझे लगा था -- वह कलाई जैसे जानी-पहचानी है -- जैसे उसे पकड़ कर मैंने कभी चलना सिखाया था। वह इतनी बड़ी कब हो गयी.. पता ही नहीं चला!

ऐसे ही एक बार जब तुमने कहा था -- 'कैसे हो .. ?' -- तब भी लगा था, इतनी बड़ी कब हो गयी .. ? -- पता ही नहीं चला! अब भी जब तुमसे कोई बात होती है -- कब वह याद बन जाती है -- पता ही नहीं चलता। बस, जब-तब मन के अंधेरे में तुम्हारे कमरे से साथ आई रोशनी जगमग करती है तो पता चलता है कि कोई और बात एक और याद बन गयी है!

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