- बत्रा क्लीनिक चलोगे?
- बैठो, सत्तर रुपए।
- जहां तक 50 बनें, उतार देना। आगे पैदल।
.. डॉक्टर से तो उस वक़्त जवाब देते नहीं बना जब मैंने धीरे से कहा, '1750 में आधी रूट-कनाल कर दोगी?'
..वक़्त-वक़्त की बात है। वो भी दिन थे जब होटल रिसेप्शन पर हमारे 'कमरा या कमरे' नहीं, पूरा होटल लेने की बात पर मैनेजर ही उठ कर चला आता था। तब भी होटल छोटा पड़ता था। ज़्यादातर यह 20 कमरों के थे। एक-एक एक्स्ट्रा-बेड से भी 70 लोगों को दिल्ली जैसे शहर में 3 दिन के लिए ठहराने की बात नहीं बन रही थी। होटल पिकासो, वॉटरफॉल, स्विफ्ट-इन व रोहतक रोड पर दायें-बायें काफी कोशिश करते थे। मायापुरी में एक बड़ा होटल मिला जागीर पैलेस, पर काफी पुराना लुक होने पर पसंद नहीं आया। कई दिन तक उसका मैनेजर मिन्नत करता रहा। बेटी की शादी में बारात को तीन दिन ठहराने का करीब साढ़े तीन लाख का खर्च आ रहा था। फिर वही बात हुई - God helps me meeting right person at right time! जनरल स्टोर वाले ने कहा, 'कोई बड़ी कोठी किराए पर क्यों नहीं ले लेते। केटरिंग अलग करा लो।' बात जंच गई। एक नहीं दो कोठियां किराए पर ले लीं। भई, हमारे लोगों को भी तो कहीं रहना था। ..बस, अपने अमीरी के दिनों के बारे में इतना ही! (कल रूट-कनाल के बकाया 800 देने हैं!)
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