क्राउन लगाते हुए डेंटिस्ट ने सही कहा था, मैं एकदम खराब नतीजे पर बहुत जल्दी पहुंच जाता हूं। सच भी है। लोगबाग सेंसेक्स, गोल्ड रेट आदि ऊपर-नीचे होते हुए देखते हैं, मैं स्टेंट के रेट अखबार में देखता रहता हूं। कम होते जाने पर मन ही मन केजरीवाल जी को इस बात पर तो थैंक्स करना बनता है जिस तरह वह हस्पतालों के मनमाने रवैये पर भी लगाम कस रहे हैं। कब तक मुझ जैसा एक आम आदमी रोज रात सिरहाने के नीचे एटीएम कार्ड और नोटों की पोटली रख कर सोए। दाखिल होने से पहले ही हस्पतालों के रिसेप्शन एक मोटी रकम जमा करने को कहेंगे। आधी रात कुछ हो जाए तो पता नहीं घर वाले कैसे संभालेंगे। काफी वक़्त तो इसीमें निकाल देंगे कि कहां की एम्बुलेंस बुलाएं। अपनी कार से ले जाने की सोचेंगे तो टाइम पर बेटे को अपना लाइसेंस नहीं मिलेगा, मैडम को एटीएम कार्ड। फिर गाड़ी नहीं निकलेगी। रात में कोई न कोई सरफिरा पीछे अपनी गाड़ी खड़ी कर गया होगा। निकल भी गए तो फिर हस्पताल की पार्किंग ढूंढते रहेंगे। कई बार तो बायगॉड दिल करता है एक बार पहले ही इसकी रिहर्सल कर लो! कब तक झूठी आशाओं के सहारे जिएंगे कि फेसबुक पर इतने डॉक्टर दोस्त हैं -- कोई मेडिकल डायरेक्टर तो कोई सीएमडी -- कोई न कोई संभाल ही लेगा। जब एक अज़ीज़ डॉक्टर ने खुद कहने के बाद आज सारा दिन फोन नहीं किया, तो आधी रात कौन किसी को हस्पताल में हमारी सिफारिश करेगा कि भैया जल्दी भर्ती कर लो.. अभी तो एकाध स्टेंट में काम चल जाएगा। वैसे तो हम शुरू से भाग-भाग कर काम करने वाले रहे हैं, पर ऐसा कोई फिक्स्ड रूल तो है नहीं कि दुबले-पतले लोगों को कोई ऐसी बीमारी नहीं होगी। आखिरकार बेटे ने चार-पांच लाख की मेडिकल इंश्योरेंस पालिसी ले ही दी। सच, आज चैन की नींद आएगी!.. न, न, नाराजगी किसी से नहीं। अपनी तो शुरू से यही टैगलाइन है -- जो साथ दे, उसका तो हो ही -- "जो न दे, उसका भी भला!"
बुरी बात है यह, नानाजी को कोई फोन नहीं करता!
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