कभी अलविदा न कहना!
30 जनवरी को हम दो की बजाय ढाई मिनट का मौन रख लेते हैं। वैसे भी ढाई अक्षर प्रेम के कहे जाते हैं। आधा मिनट की हमारी अपनी प्रेम श्रद्धांजलि हो जाती है।। मोबाइल वगैरा तो तब थे नहीं। सुबह नौ बजे जब एक मिनट का सायरन बजता था तो हम दर्शनार्थ उधर से गुज़रते थे। ऐसे ही 30 जनवरी 1970 को उसने कागज़ की एक गोली-सी बनाकर हमें मार दी थी। "पिताजी कहते हैं, लड़के का पंडित होना ज़रूरी है, चाहे पान की दुकान हो!" दोस्तों ने बहुत सांत्वना दी -- कोई बात नहीं.. तेरह दिन बाद सब भूल जाओगे.. अपनी हीर-रांझा की तस्वीर गंगाजी में बहा आओ!.. बहा दी कल -- 46 साल बाद!!
Artist S. Sobha Singh's painting
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