बहुत लाड़, प्यार और प्रयास से हमने दामाद जी का नाम अपने पैसेज रिकॉर्ड में जुड़वाया था। बेटी-दामाद यू.एस. से बैंगलोर आए तो सोचा बैंगलोर से दिल्ली आने-जाने का उनका R1 टिकट हम बनवा कर रख लेते हैं। नातिन का इन्फेंट टिकट जब वह बैंगलोर एअरपोर्ट से ले रहे थे तो बेटी ने हमें फोन किया कि क्या हमारा इन्फेंट टिकट दस हज़ार का है? हमने कहा कि नहीं, सात-आठ सौ का होगा। जल्दी ही एक मैसेज आ गया कि अब वे जेट से आ रहे हैं। मिलने पर पता चला कि दामाद जी हमारी टिकटों पर यात्रा करते घबरा रहे थे कि 40 दिन के बच्चे के साथ अगर उन्हें एक ही फ्लाइट में सीटें न मिलीं या साथ-साथ न मिलीं तो मुश्किल हो जाएगी। इसलिए उन्होंने चुपचाप ऐसा कर लिया कि बताने पर हम हल्ला मचाते। वैसे भी वह हमारी 'adventurous stories' से बहुत डर गए थे कि हम कब-कहां-कैसे ऑफ-लोड हुए!.. यहाँ अनावश्यक होते हुए भी विशेष तौर पर बता दें कि हमें दामाद/बहू आदि शब्द बिल्कुल अच्छे नहीं लगते और हम इन्हें बेटा-बेटी कहना ही पसंद करते हैं। "कन्यादान" शब्द के पीछे तो हम हाथ धो कर पड़े हुए हैं - एक पत्रिका में हमने ऐलान भी किया था कि इसकी जगह वर्तमान परिप्रेक्ष्य में कोई अन्य उपयुक्त शब्द बताओ और पुरस्कार में हमारी एक माह की पेंशन पाओ! अभी कुछ लोग गंभीरतापूर्वक विचार कर ही रहे थे कि तभी किसी ने कह दिया: अरे! यह 1100 रूपए की पेंशन वाले हैं!
Thursday, 5 July 2018
R1, R2 और दामाद जी!
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