Monday, 25 September 2017

सीएमडी (आर)

हमारा पड़ोसी "कार मैकेनिक दिलेर" - "सीएमडी" बुलाने पर खुश हो जाता। रोज़ाना एक दिन पुराना हिंदी का अखबार लेने आता, शाम को वापस कर जाता। बारह साल पहले  मारुति 800 लेने हम उसीको साथ ले गए थे। वह ही उसकी सर्विसिंग आदि करता। 99,999 की मीटर रीडिंग की तो उसने फोटो भी ली थी। चारों व्हील और कई अंजर-पंजर इस अवधि में उसने बदले। कई बार टेम्परेचर की रीडिंग अचानक बढ़ जाने पर मैं उसे अब गाड़ी चलाते डर लगने की बात कहता। वह हर बार कहता, चिंता न करो, आपके लौटते ही देखता हूं। बस, दूसरे कार मैकेनिक दिलावर के पास मत चले जाना। मेरा काम है गाड़ी में जान फूंकना, उसका काम है, गाड़ी बिकवाना। सब उसे "सीएमडी-सेल्स" कहते हैं। कुछ दिन बाद एयरपोर्ट से लौटते, धौला-कुआं के पास छह लेन ट्रैफिक में कार रुक गई। बड़ा अटपटा लगा जब स्टार्ट ही न हो। दिलेर को फोन किया। उसने कहा, बोनट खोलकर पहली पाइप के दोंनो सिरे अदल-बदल कर, इधर का उधर, फिट कर दो। ऐसा करते ही कार स्टार्ट हो गई तो जान में जान आई। लेकिन घर पहुंचने से 4-5 किलोमीटर पहले ही फिर रुक गई। दिसम्बर का महीना था। अपने स्कूटर पर कंबल ओढ़े दिलेर वहां पहुंचा और फिर कार स्टार्ट की। यह बात दिलावर तक भी पहुंची। बोला, "कब तक घसीटोगे -- बावन हज़ार एक.. दो.. चलो, पचपन हज़ार!"  अगले दो दिन छुट्टी थी, सोचा, पहले दिलेर से ही बात करेंगे। पर वह तो आधा इंजिन ही खोल चुका था। "अबकि बार अगर गाड़ी रास्ते में रुक जाए तो सीएमडी मत कहना!" ..दूसरे कार मैकेनिक "सीएमडी-एस" (सेल्स) की तर्ज पर अब दिलेर ने भी अपनी नेम-प्लेट बनवा ली है -- "सीएमडी-आर" (रिवाइव)। अखबार लौटाने आने पर कई बार वह अपने कमेंट्स भी कर जाता है: "कार हो या जहाज, सीएमडी जान फूंकने वाला होना चाहिए। आपके तो अच्छे दिन आते-आते रह गए.. बुला लिया था जान फूंकने वाला सीएमडी.. चल दिए बेचने!"

Friday, 22 September 2017

बड़ी देर से आए हैं ..

बड़ी देर से आए हैं..

आखिर क्या है ऐसा श्री अश्वनी लोहानी की शख्सियत में कि हम एयरलाइन्स की टीम छोड़कर रेलवे टीम में आ गए! यूं तो उनसे बरसों पहले ही मिलना हो जाता। 1972 में ही रेलवे के असिस्टेंट स्टेशन मास्टर का एग्जाम पास किया था। इंटरव्यू में हॉबी के बारे में पूछने पर मैंने कहा 'कविताएं लिखना'। वह बोले, 'आपकी हॉबी तो बहुत सॉफ्ट है, रेलवे की नौकरी बहुत कठिन (सो, रिजेक्टेड)!' चार साल बाद एयर इंडिया के इंटरव्यू में भी यही पूछा गया। पिछले इंटरव्यू से सबक लेते हुए बोल दिया, 'बागबानी!' उनकी नज़रें कह रही थीं, 'मतलब लिखने-पढ़ने से कोई नाता नहीं (रिजेक्टेड)!' फिर छह साल बाद इंडियन एयरलाइन्स में अंत में भी यही सवाल पूछा गया। "..सुबह बागबानी, शाम को लिखना!" सलेक्टेड! ऐसे ही तीस साल बीत गए। ..अब लोहानी साहब का व्यक्तित्व फिर उधर खींच रहा है। वैसे भी रेलगाड़ी की अनेकों यादें हर किसी से जुड़ीं हैं। पिताजी 1968 में और बड़े भाई 1994 में रेलवे से रिटायर हुए थे। बड़ी देर से आए हैं, प्यार का तोहफा लाए हैं!

Shri Ashwani Lohani liked it within minutes!

Thursday, 14 September 2017

हाथी, घोड़ा, पालकी, जय कन्हैया लाल की!

Can you expand these pics into words - a sentence?!

🐘
     🏇
          🚡
               🙏
                     कन्हैया
                               🔴
                                   🔑

Tuesday, 12 September 2017

तेरी कहानी ..

.. फिर तेरी कहानी याद आई!

"किस-मी पारले"

('पारले' मत कहो न!)

Saturday, 9 September 2017

आओ लकीर पीटें (बुद्धिजीवी बनें!)

सांप तो कभी का जा चुका। आओ हम लकीर ही पीट लें -- कहां से आया, कैसे आया, कहां गया। कोई दूरदर्शी ही किसी संभावित खतरे की बात कहता है। कुछ उस से निपटने की तैयारी भी करते हैं। पर एक बड़ा वर्ग तो कुछ हो जाने पर ही अपनी 'फीड बैक' देता है। यह कौनसा आसान काम है। उसके लिए लकीर पीटनी पड़ती है। ऐसे ही थोड़े कोई बुद्धिजीवी का दर्जा हासिल कर लेता है। ऐसे लोग तो हमें जरा नहीं सुहाते जो कहते हैं "अब लकीर पीटने से क्या फायदा"। ऐसे लोग ही बुद्धिजीवियों की दुकान, सम्मेलन, गोष्ठियां, कॉफी हाउस की 'वर्क शॉप' आदि बंद कराना चाहते हैं। वे भूल जाते हैं कि नवनिर्माण उनकी 'फीड बैक' पर ही तो होगा। एक तरह से सारा संचारतंत्र बुद्धिजीवियों की इस विचारशिला पर ही टिका है। बरसों पहले रेडियो पर एक प्रोग्राम भी आता था "आओ तबसरा करें"। अर्थात जो हो गया उसका लेखा-जोखा रखें। पूर्व चेतावनी देने वाली दूरदर्शिता अब कहां।'यूरेका' 'यूरेका' चिल्लाता नवीनता का संदेश लिए भी अब कौन भागता है!

                       आधुनिक आर्किमिडीज़!

Friday, 8 September 2017

'आपके वाले' सीएमडी

"नाना जी, मैं छोटी 'सीएमडी' लग रही हूं न?" लोहानी साहब जैसा चश्मा लगा कर मेरी नातिन ने पूछा। मैं समझ गया, मेरा आधा-अधूरा ब्लॉग पढ़ कर अब तो यह छुटकी सवालों की ऐसी झड़ी लगा देगी कि एक कहानी ही बन जाएगी। -- नाना जी, क्या सीएमडी के छोटे-छोटे पंख होते हैं.. फिर वह इतने सारे जहाजों को कैसे देखते होंगे.. क्या वह उड़ते ही रहते हैं.. जमीन पर उनके पांव नही टिकते.. फिर तो वह किसी से मिलते भी नहीं होंगे.. बस, घर से जहाज में बैठे.. इधर-उधर घूमे, मतलब उड़े, और शाम को घर की छत पर उतर गए!.. फिर लोहानी साहब आपको कहां मिले.. वह "उड़ने वाले" सीएमडी क्यों नही थे.. क्या वह "माई फ्रेंड गणेशा" की तरह किसी गुफा में रहते थे.. और किसी के भी बुलाने पर झट आ जाते थे.. किसी को देखने हॉस्पिटल भी चले जाते थे.. सबकी मदद को तैयार रहते थे.. मैंने आपका मोबाइल देखा -- वो तो आपके मैसेज का जवाब भी देते थे.. "वह जमीन से और एक आम आदमी से जुड़े थे" इसका क्या मतलब हुआ?..आपको अपने कई सीएमडी के नाम भी याद नहीं.. फिर लोहानी साहब को क्यों सब लोग इतना प्यार करते हैं.. "पहाड़ पर चढ़ने वाला झुक कर चलता है, नीचे उतरने वाला अकड़ कर चलता है.." यह भी समझ नहीं आया.. अच्छा, अब मैं समझी-- "आपके वाले" सीएमडी "माई फ्रेंड गणेशा" की तरह थे--लाखों में एक!

("Touched I am!" Mr. Ashwani Lohani comments)

Friday, 1 September 2017

रामायण: आनुषंगिक कथाएं

सीता-राम के विवाह से पूर्व एक रोज़ राजा जनक के दरबार में एक भोज का आयोजन था। विविध पकवान परोसे जा रहे थे। जैसे ही राजा जनक ने खीर खाना आरम्भ किया, सीता जी की नज़र उनके खीर के पात्र में एक तिनके पर पड़ी। भरी सभा में कुछ कहना उन्हें उचित नहीं लगा और न ही वह उसे अनदेखा कर सकती थीं। तभी उन्होंने एकटक उस तृण को देखा। अगले ही क्षण वह जल कर खीर के पात्र के एक किनारे चिपक गया। राजा जनक ने यह सब होते हुए देख लिया। सभा समाप्ति पर उन्होंने अपनी पुत्री से कहा, "मैं जान गया कि आप भगवती स्वरूपा हैं; किंतु कभी अपनी शक्ति का प्रयोग किसी के अहित में नहीं करना।" अशोक वाटिका में रावण के आने पर सीता जी का हाथ में एक तृण पकड़े रहना अपने पिता की इसी बात को स्मरण रखना था अन्यथा रामकथा ही बदल जाती। कुछ लोगों का इसे डूबते को तिनके का सहारा कहना नितांत हास्यास्पद है। सीता जी को स्पर्श कर पाना ही असंभव था; फिर उनका हरण कैसे हुआ। इस संबंध में भी एक कथा का प्रसंग है। वनवास के समय एक रोज़ लक्ष्मण जी की अनुपस्थिति में श्री राम ने सीता जी को अग्निदेव के संरक्षण में सौंपा और तत्पश्चात वह उनका प्रतिबिंब मात्र रहीं। रावणवध के पश्चात तथाकथित अग्नि परीक्षा का आशय भी अग्निदेव से सीता जी को वापस लेना था। लक्ष्मण जी का क्रोध देखकर उस समय ही श्री राम ने उन्हें वास्तविकता से अवगत कराया था।