Thursday, 18 July 2019

-- टूटना--

मनोवैज्ञानिक कहानी:

"टूटना"

पलंग पर कंबल ओढ़े एक बेजान-सा शरीर पड़ा है। कमरे में मेरे पांव रखने की आहट से वह चौंका नहीं है। दरवाज़े मैंने पहले की ही तरह भिड़ा दिए हैं। घर के बाहरी भाग में जितना भी शोर है या नीरवता है, उससे ज़्यादा रूखापन इस कमरे में है। उसने दोनों बाहें कसी हैं और उनमें जकड़ मानो किसी को चूम लिया है! उसकी इस हरकत पर मुझे हंसी आ गई। मैंने उसे छेड़ने की कोशिश की है। शरीर मोड़ते हुए उसने कहा है -- "झूठ मानते हो? मैंने अपने होंठ उसके अधरों पर रख दिए थे! उस तीसरे पहर बारिश भी हुई थी। भीगते हुए उसे मैंने जी भर कर देखा था!.."

अपनी दोनों बाहों के घेरे में पांवों को समेटे मैं 'ट्यूब लाइट' की दूधिया रोशनी में कुछ ढूंढने की कोशिश कर रहा हूं। एकबारगी हमारी नज़रें टकरायी हैं और उसने न जाने कितने सवाल मेरी आंखों में उंडेल दिए हैं! उसकी नज़र 'ट्यूब लाइट' की परिक्रमा कर मानो किसी खास बिंदु पर जम गई है। उसे शायद ज़रा भी अहसास नहीं कि किसी की निगाहें उसे पकड़ रही हैं। रह-रह कर उसके होंठ कुछ कहते प्रतीत होते हैं। मैं यह अनबूझ पहेली सुलझा नहीं पा रहा हूं। गहरी निस्तब्धता में हम दोनों ढंक गए हैं। लगता है वह कोई दर्द भरा गीत गा रहा है और घड़ी की मधुर-ध्वनि अपना संगीत दे रही है!..

"अपने मजबूर क़दमों पर मेरा कोई बस नहीं। तब तक न जाने कैसे बसर होगी। अपने रेलवे प्लेटफॉर्म के किसी भी किनारे मिल जाना जहां स्टेशन के नाम का बोर्ड लगा हो। साल के आखिरी दिन भी नहीं मिल पाओगी तो लगेगा सारा साल तुम्हारे बिना ही बीत गया। दिल नहीं तोड़ना!.." 

उसके नाम लिखते ही हवा का एक झोंका उसे कुछ और लिखने की अनुमति नहीं देता। धीरे से उसे संभालते हुए वह तेज़ क़दमों से स्टेशन की ओर बढ़ जाता है। आने-जाने वाली किसी भी गाड़ी की आवाज़ उसका मन आशंकित कर देती है। रेलवे ब्रिज के नीचे वाली सड़क पर चलते वह आती हुई गाड़ी देखकर दौड़ पड़ता है। उसके सीढियां चढ़ते-चढ़ते गाड़ी थम गई है। हर डिब्बे में नज़र घुमाए वह प्लेटफॉर्म के आखिरी सिरे तक आ पहुंचा है। लौटते हुए उसकी चाल ढीली है और उसके कान गाड़ी छूटने की 'विसिल' की प्रतीक्षा नहीं कर पा रहे हैं। सिग्नल देखने के लिए उसने पीछे गर्दन घुमायी है। एकाएक उसके कदम उसके सामने वाले 'कंपार्टमेंट' के दरवाज़े के बाहर रुक गए हैं। उसकी आंखों में चमक है। आज उसका किसी बाहरी शक्ति में विश्वास हो चला है। अगर हवा का वह झोंका खत न उड़ा ले गया होता तो यह गाड़ी कभी की आंखों से ओझल हो चुकी होती।

उसकी उंगलियां उस खत को छूने लगी हैं जिसके सहारे उसे इंतज़ार के इतने दिन काटने हैं! जिसके माध्यम से उन दोनों को मिलना है! तभी इंजन चीखा है और उसकी उंगलियों से छटपटाता वह खत दोबारा उसी की जेब में ही गिर गया है। उसे कोई तरकीब नहीं सूझ रही है। सिर्फ एक भिखारी उस डिब्बे में चढ़ने की कोशिश कर रहा है। उसने मन ही मन उस भिखारी से कहा है -- "यह चिट्ठी उस शहज़ादी तक पहुंचा देना।" और मनगढ़ंत जवाब भी उसी के मन ने दे दिया है --"कितने पैसे दोगे, बाबू?"

मजबूरी फिर उसके कदम आगे घसीट ले जाती है। उसे बड़ी देर में ख्याल आया कि भिखारी अंधा है। उसने मन ही मन महसूस किया कि उसके भीतर कोई खिलखिला कर हंस दिया है। प्लेटफॉर्म का आखिरी सिरा फिर आ पहुंचा है। उसने खत के टुकड़े-टुकड़े कर बिखेर दिए हैं। लाइनें क्रॉस कर वह दूसरे प्लेटफॉर्म के इर्द-गिर्द लगे जंगलों में बाहें डाल दूर जाती गाड़ी देखता रहा है और उधर ही ढलान पर से उतर गया है।

.."काश, उस भिखारी की आंखें होतीं!" अबकी बार मैंने स्पष्ट सुना है और नज़र बचाने की चेष्टा की है। उस रोज़ उसकी इस बेताबी पर मैं बरबस हंस दिया था। वह चोट आज भी उसके दिल में है।

उसी समय बाहर से किसी की आवाज़ ने इस खामोशी को तार-तार कर दिया है! यह वातावरण मानो उसके अनुकूल नहीं बन पड़ा है। वह उठा है और बिना किसी से कुछ कहे बाहर निकल आया है। 'ट्यूब लाइट' के बराबर टंगी तस्वीर अंधेरे में डूब गई है!..

 -- पीछे, खेतों के बीचों-बीच छोटी-सी नहर के किनारे वह पुलिया तक आया है। उसकी यादों ने जब भी उसे रुलाया है, वह यहां आकर रो लिया है। यहां आकर फिर उसका रो लेने को दिल कर आया है; पर आज न जाने कौनसे प्यार ने उसे इतना ढांढस दिया है कि वह अपने पिछले आंसू भी पोंछ गया है। फिर भी एक आंसू उससे संभल नहीं पा रहा है। कुछ ही दूरी पर बिना कुछ कहे वह पीछे छूट गया है।

उसने बहुत धीमे-से दरवाज़ा खोला है, और कहा है-- "शाम ढल गई, वह आई होगी, चलो!" जवाब में मेरी नज़र  कैलेंडर पर उठी है और मुझे लगा है -- एक और भूल हो गई! उसने एक और चोट संजो ली है। आज उसे गए सिर्फ तीसरा दिन है।

कुछ देर ठहर उसने कैलेंडर पर आखिरी तारीख के अतिरिक्त वे सभी तारीखें काट दी हैं जब से वह गई है। संयोगवश लकीर आखिरी चौखट में भी घुस आई है। उसके मस्तिष्क ने हाथों से मानो कुछ कहा है और उन्होंने कैलेंडर को एक जोरदार झटका दिया है। कील समेत उखड़ कर वह नीचे फर्श पर आ गिरा है। उसने आखिरी महीने का कवर फाड़ कर सीढ़ियों में फेंक दिया है और पिछले महीने का कवर फिर उसी दशा में टांग दिया है। इससे उसे कुछ आंतरिक संतोष मिला है।

वह पलंग पर आ गिरा है। एक बार फिर उसने 'ट्यूब लाइट' के नज़दीक टंगी तस्वीर को देखा है और मन ही मन 'निर्मोही' कह कर करवट बदल ली है। मैंने कभी उसे, कभी उस तस्वीर को देखा है। उसने दीवार और पलंग के बीच खाली जगह में सर फंसा लिया है और दोनों हथेलियों से आंखें मूंद ली हैं।

आज इकतीस दिसम्बर है!

न जाने कौनसा बहाव उसे स्टेशन तक छोड़ गया है। इंजिन ने 'विसिल' दी है तो उसे लगा है, यह आवाज़ ज़रूर उस तक पहुंच जाएगी और एक बार ज़रूर उसकी बायीं आंख फड़केगी। जाती हुई गाड़ी में से वह पीछे मुड़ कर देखता है -- उसी का एक प्रतिरूप प्लेटफॉर्म के इर्द-गिर्द लगे जंगलों में बांह डाले उसे विदाई दे रहा है। हाथ बाहर निकाल वह उसका जवाब देने को होता है, तो उसकी कामना उसकी आंखों के आगे आ जाती है। वह दूर तक देखता चला जाता है उसे, हाथ हिलाते!..

और एक मुस्कान उसके होठों तक आती है। उसे टूटना नहीं है!

-- विजय के भटनागर

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