Monday, 22 July 2019

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बरसों पहले सावन में भगवान शिव से कुछ मांगा था.. बीस साल रेगिस्तान का सफर करा दिया। झोली थी छोटी -- न सुख संभलता था, न दुःख। "जो न दे उसका भी भला!" यही जीवन की टैग लाइन बन गई थी। भगवान ने सोचा, कुछ मांगने तो यह आएगा नहीं, शायद 'थैंक्स गिविंग' के लिए आ जाए। फिर, यह मुहावरे भी तो याद रखवाने हैं -- उसके घर देर है, अंधेर नहीं; जब देता है, छप्पर फाड़ के देता है। बस, लंबे रेगिस्तान के सफर के बाद मिल गया दो घूंट पानी। अतीत की धुंधलाई तस्वीरें जैसे नए रूप में किसी ने भेज दीं। मंदिर में लोगों की मन्नतों की भीड़ में आज मैं चुपचाप अपना धन्यवाद अर्पित कर आया!

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