हम तो फूले नहीं समाए जब एक रोज़ हमारी एक-दो रचनाएं कहीं पढ़ कर बच्चों ने कहा: पापा आप तो बुद्धिजीवि बन गए! रात भर नींद नहीं आई कि किसी और से कैसे पूछें। सुबह छः बजे की बजाय, साढ़े चार ही सैर को निकल गए। अभी पार्क में एक ही व्यक्ति चक्कर काट रहा था। सोचा, अच्छा मौका है, इसी से बातों-बातों में पूछ लेंगे। यही सोच कर उसके पीछे तेज़-तेज़ चलने लगे। कुछ देर बाद रुक कर वह बोला: कुछ पूछना चाहते हैं आप? हमने भी झिझकते हुए कहा: बस, यही पूछना था कि क्या हम बुद्धिजीवि लगते हैं? हमें ऊपर से नीचे देखते हुए वह बोला: लगते तो नहीं; बल्कि हम तो डर ही गए थे जिस तरह सुनसान पार्क में आप हमारे पीछे दौड़ रहे थे!.. तभी एक और आवाज़ सुनकर हम भी चौंक गए: अरे! इधर आइए न, बुद्धिजीवि जी, सालों बाद आज आप इतनी जल्दी आए! -- लीजिए, ऐसे ही इन्होंनेे एक दिन हमसे पूछा था कि आखिर वह हमें किस तरह बुद्धिजीवि लगते हैं। (हमें तो जवाब देने वाला भाग गया) यह हमारे जवाब से बहुत खुश हुए थे कि समान विचार वाले ही एक-दूसरे को आकर्षित करते हैं.. और तब से हमें अपने ग्रुप के जॉइंट एडमिन के लिए ढूंढ रहे थे। चलिए, हमें भी रिटायरमेंट के बाद नौकरी मिल ही गई ।।
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