Friday, 5 July 2019

पक्षी

हमसे तो पक्षी अच्छे!

आ गया हमारा कबूतर वापस! विश्व पर्यावरण दिवस पर एक कबूतर जोड़े की फोटो लेने के बाद से ही एक लापता हो गया था। केवल एक को ही गुमसुम देखकर दिल बहुत दुःखी होता था। अब दो हो गए तो फिर किसी तीसरे को नहीं आने देते। दूसरी ओर गोरैया चीं-चीं करके अपने सभी साथियों को खाने पर बुलाती हैं। कौवे को कितना ही काला कह लो.. दिल का इतना साफ कि दूर से देखकर ही कि दीवार पर खाने को कुछ रखा जा रहा है, कांव-कांव कर दोस्तों को बुलाना शुरू कर देता है। कहीं आस-पास से बिल्ली को जाते देख तो वे ऐसी घमासान तैयारी करते हैं कि उसे ही भागना पड़ता है। बहुत अधिक ऊंचाई पर समूह में उड़ते पक्षी भी अपनी सुरक्षा के लिए एक विशिष्ट आकृति में रहते हैं। किसी पक्षी को कहीं किसी शाखा, खंबे की तार या पतंग की डोर आदि में फंसा देख भी वे शोर मचा कर हमारा ध्यान आकर्षित कर मदद के लिए पुकारते हैं। अनायास ही अपने बदले हावभाव से कई पक्षी किसी संभावित विपदा की भी सूचना देते हैं। पक्षियों के कलरव में कोयल कहां किस आम के पेड़ में छुपी 'कूक' रही है, पता ही नहीं चल पाता। भीड़-भाड़ छंट जाने पर प्यारी-सी बुलबुल आती है। पानी की कटोरी पर बैठ कर वह कई बार इधर-उधर देखकर अपनी सुरक्षा का जायज़ा लेती है कि कहीं कोई घात लगाए तो नहीं बैठा..और तब कहीं एक घूंट पानी पी कर फुर्र हो जाती है! उसके इस अंदाज पर यह गीत याद आ जाता है -- 'पहले सौ बार इधर और उधर देखा है, तब कहीं जाके तुम्हें एक नज़र देखा है!' पता नहीं क्यों बुलबुल हमें स्कर्ट पहने पब्लिक स्कूल में पढ़ने वाली-सी लगती है! अब इस बात पर बखेड़ा मत करना कि कौवे क्या सरकारी स्कूल में पढ़ते हैं!

Thursday, 20 June 2019

कितने असंवेदनशील हैं कुछ लोग.. रास्ता पूछने के लिए अभी कुछ बोला ही नहीं था कि उन्होंने "नहीं मालूम" की गर्दन हिला दी। यह शायद वे लोग हैं जो व्हाट्सएप पर आपके गुड मॉर्निंग-गुड इवनिंग का भी कोई जवाब नहीं देते। दूसरी ओर कुछ लोग कोई जवाब न पाकर फिर गुड-नाइट का मैसेज भेज देते हैं। कुछ लोगों का तो रात तक ही  "गुड-मॉर्निंग" चलता रहता है। थोड़ा-बहुत बुरा तो मुझे भी लगता है जब कोई  'रेसिप्रॉकेट' नहीं करता। अब कोई अनिवार्यता तो है नहीं कि दूसरा जवाब दे ही या पूछा गया रास्ता बताए ही। हां, ऐसे दोस्तों के लिए मैंने खुद को थोड़ा बदल लिया है। अब गुड-मॉर्निंग की जगह मैं उन्हें मात्र एक बिंदु (डॉट) भेजता हूं। मजे की बात, वे उसे देख भी लेते हैं, पर कोई कुछ पूछता ही नहीं कि मैं कह सकूं - Good Morning के 'आई' की बिंदी है!

Tuesday, 11 June 2019

दुविधा

'दुविधा'

-- सखि,
वो आए,
बोले --
'हाय, चिकन!'
... ...

फिर --
... ...

'घबराओ नहीं,
मैं वेजीटेरियन हूं!

-- विजय के भटनागर
   28.4.1982

Friday, 7 June 2019

झोला-चुक

'झोला चुक'

सरकारी नौकरी में छोटे-बाबू, बड़े-बाबू (LDC/UDC) की तरह, मेरी पहली नौकरी में इन्हें जूनियर/सीनियर क्लर्क कहा जाता था। सालाना 6/- रुपए की इन्क्रीमेंट लेते 15 साल बाद बड़े बाबू बनने की उम्मीद होती थी; और फिर उसी पायदान पर अधिकांश रिटायर हो जाते थे। जॉइनिंग के दिन कमरे में पहला कदम रखते ही कुछ ऐसा स्वागत हुआ था --'लो एक और पंछी आ गया पिंजरे में!' 15-20 साल से एक ही जगह रह रहे वे लोग कह तो ठीक ही रहे थे। 'आउट ऑफ द वे' प्रमोशन पाए अपने किसी क्लीग को वे बातों-बातों में 'झोला चुक' कहते थे। जान-पहचान बढ़ने पर एक दिन 'झोला-चुक' का मतलब पूछ ही लिया। '..अरे, वही, जो महाराजा का गाउन उठाते हुए चलते रहते है.. अफसरों के दुमछल्ले!' .. करीब 35 साल बाद अभी कुछ दिन पहले ही मैंने उस व्यक्ति का धन्यवाद किया जिनके उपहास स्वरूप मैंने वह नौकरी छोड़ने की ठान ली थी। अपना ओहदा बताने पर वह 'ही-ही' कर बोले थे --'एक तो क्लर्क, वो भी जूनियर!'

Wednesday, 5 June 2019

Ji Sir/Madam ji!

Ji-Sir-ji/Ji-Madam-ji --Gone are the days!

Remember those childhood days calling our Madam or Sir so respectfully -- prefixing and suffixing "Ji"? Little grown up, we started prefixing Dear/Respected/Hon'ble with Sir/Madam (though Sir/Madam itself is respectful).  Even we used to write "Most respectfully" I beg to state.., and "I remain" yours faithfully, etc. With all this in our mind, we used to ask as what is your "good" name? Once a foreigner was amused, rather baffled over it as "a name is a name" and asked back as what's a "good name"? Interestingly, when we were doing here "dandwat pranam" to our 'aakas', the West was practising "Hi, Jimmy", or Hi, Mr. Carter" or "Hi, Mr. President"! No doubt, they give due respect to their King/Queen too as "His/Her Highness". This is just a rough sketch without going into details meticulously.  However, it's heartening now-a-days to note youngers addressing their seniors or even CEO by his/her first name. It gives a feeling of being under one roof -- the entire team believes. In our times, we had perhaps made sheds of different heights. Their 'Hi' or 'Hello' seems to be just a pure compliment; our salutations were perhaps attached with a silent small wish of getting little favour, forget-me-not type, in return! That's why we (humorously) used to put more 'weight' on conveying our respects!           

Thursday, 30 May 2019

सोच

Humour 1/2

कहते हैं न कि सकारात्मक सोच, सकारात्मक परिणाम। (Positive thoughts bring positive results!) आज हमें Abacus Co. का एक छोटे-से काम के लिए फ़ोन आया। रणथंभौर नेशनल पार्क के एक-एक पंक्ति के लगभग सौ साइनेज बोर्ड का दो घंटे में अनुवाद करना था। हमने सहर्ष स्वीकार कर लिया तो वह बोले: "आपकी पेमेंट?" रिटायरमेंट के बाद पहली बार  यह शब्द सुन कर हम तो फूल की पाँखुरियों की तरह लक्ष्मी जी के चरणों में बिखर गए! अपने को संयत करते हुए बोले: "हम हिंदी-प्रेमी हैं - छोटा-मोटा काम कभी भी कंप्लीमेंट्री करने पर हमें ख़ुशी होती है। चिंता न करें।" नियत समय पर उनका एक सहायक आ गया और हमें एक हज़ार देने का आग्रह करने लगा। बातों-बातों में पता चला कि वह कॉपी राइटिंग के लिए पांच रूपए प्रति शब्द देते हैं। हमने मन-ही-मन उन प्रेस वालों की पोटली पर एक और गोली चला दी जो हमें आठ पैसे प्रति शब्द दे रहे थे। ("पोटली" के लिए नए दोस्तों को हमारी कुछ पुरानी पोस्ट देखनी होंगी। पाकीज़ा फ़िल्म भी देख सकते हैं!)
चलिए, आज हमारी उन दो सौ रूपए की भरपाई हो गई जो "वो" ऐंठ कर ले गए थे। अभी घर बसा नहीं था और उचक्के पहले आ गए थे। मिनिस्ट्री के अनुवाद पैनल के लिए वेरिफिकेशन चल रहा था। बहुत कहा: कुछ शर्म करो; दूसरी पारी की विकेटें गाड़ रहे हैं; पर उनकी नज़र सामने मार्किट की बियर शॉप पर टिकी हुई थी। (यह "वो" शब्द शायद माननीय सुप्रीम कोर्ट के विचाराधीन है, वही इसके अच्छे-बुरे की व्याख्या करेंगे।) ..नए मित्रों को यह भी बता दें कि कंप्यूटर टेबल पर "बिखराए" कागज़ात वर्क-फ्रॉम-होम के नाम पर हमारी एक नई पहचान है। आज एक हज़ार मिल जाने पर यह पूरी तरह झूठ या केवल व्यंग्य ही नहीं - आधा-सच तो है ही!

Wednesday, 29 May 2019

Humour

Humour

सी एम डी के सर्कुलर की वजह से हम मजबूर थे ट्रेनिंग पर जाने को। वैसे सुबह से ही हमें किसी अनहोनी की आशंका थी और हम सोच ही रहे थे कि ग्रह-दशा अनुसार कौनसा पाँव पहले घर से बाहर निकालें। तभी बच्चों ने ध्यान भंग कर दिया: पापा, इतनी बड़ी ट्रेनिंग पर जा रहे हो, आज तो अपना लाइटर जैसा मोबाइल मत ले जाओ। और उन्होंने अपना टच-स्क्रीन टाइप मोबाइल हमें थमा दिया। हम पहले ही बता चुके हैं कि सॉफ्ट स्किल ट्रेनिंग प्लस सॉफ्ट टच आदि का कॉम्बिनेशन तो हमारे लिए अंगारक-योग बना देता है। इसी ऊहापोह में आधा घंटा देर से ट्रेनिंग पर पहुंचे। सोचा, घर पर तो भूल ही गए थे कि कौनसा पाँव पहले बाहर निकालें, यहाँ कमरे में घुसने के लिए ही थोड़ा सोच लेते हैं। इतने में ही आवाज़ आई, "पालकी भिजवाएं क्या अंदर आने के लिए - यह आने का समय है?" अंगारक-योग में कोई और हमसे खुद-ब-खुद बुलवाता रहता है: "हम तो आना ही नहीं चाह रहे थे। सी एम डी के सर्कुलर के कारण आ गए। हमारे पांव तो साईं बाबा के मंदिर की ओर ही ले जा रहे थे। ऐसी ट्रेनिंग की बजाय हमें वहीँ ज़्यादा सुकून और सीखने को मिलता है।" --"नथिंग विल गो टू योर सी एम डी; इतने आक्रोश का कारण?" --"सबसे बड़ा कारण तो यही है कि हम केवल अपने वेदों के रचयिता व्यास जी आदि को ही अपना आध्यात्मिक और मोटिवेशनल गुरु मानते हैं, आपको नहीं।' -"'इंटरेस्टिंग.. यह हम खुद को नहीं मानते, आप लोग ही हमें गुरु बना देते हैं!" --नहीं, आप ही अपनी मोटी कमाई से ऐसे इश्तहार छपवाते हैं। हम तो बच्चों का मेट्रिमोनियल एड भी किश्तों में पैसे देकर छपवाते हैं! ऐसी ट्रेनिंगों के बड़े खर्चे के कारण ही हमारा बोनस मारा जाता है। दीवाली पर पिछले साल के दिये ही ढूढ़ते रहते हैं!" --"ट्रूली, इट विल नॉट गो टू योर बॉस; टेल मी - आप मेरी जगह फिर किसको यहाँ चाहते है?" ..हम भी नरम हुए: "सर, हमारे कप्तान मौसम के झंझावातों में यात्रियों से भरे जहाज़ को सकुशल निकाल ले जाते हैं; केबिन-क्रू सेवा-श्रूषा करते नहीं थकते; विपरीत परिस्थितियों में हम टाई खिंचवाते हार नहीं मानते --फिर आप अब हमारा क्या "परिवर्तन" करने आए हैं?..फिर भी अगर कुछ समझाना ज़रूरी है तो हमारे इस बड़े परिवार में ही कई प्रतिभाशाली लोग मिल जाएंगे; कोई उन्हें ढूँढने का सर्कुलर क्यों नहीं निकालता?" ..और तभी हम टच-स्क्रीन मोबाइल की घंटी सुनकर घबरा गए जो बच्चों ने हमें ऑफ करना ही नहीं सिखाया था कि बायें से दायें स्वाइप करना है या दायें से बायें। सर जी ने ताना कसा: "मन मोहन सिंह कालिंग!' और सब ही-ही करने लगे जो अभी तक हमारे साथ थे। हमने हड़बड़ी में दरवाज़े के पास खड़े भाई को फ़ोन देकर कहा कि ज़रा बाहर जाकर मैसेज ले लो और इसे अपने पास ही रखना। मन मोहन जी पर हंसना हमें अच्छा नहीं लगा। सॉफ्ट-स्किल्स के टॉप पर तो वही हैं। बिना बोले ही सारा काम चला लेते हैं! (..और हम एक स्माइली से ही खुश हो जाते हैं!)  ☺