Wednesday, 29 May 2019

Humour

Humour

सी एम डी के सर्कुलर की वजह से हम मजबूर थे ट्रेनिंग पर जाने को। वैसे सुबह से ही हमें किसी अनहोनी की आशंका थी और हम सोच ही रहे थे कि ग्रह-दशा अनुसार कौनसा पाँव पहले घर से बाहर निकालें। तभी बच्चों ने ध्यान भंग कर दिया: पापा, इतनी बड़ी ट्रेनिंग पर जा रहे हो, आज तो अपना लाइटर जैसा मोबाइल मत ले जाओ। और उन्होंने अपना टच-स्क्रीन टाइप मोबाइल हमें थमा दिया। हम पहले ही बता चुके हैं कि सॉफ्ट स्किल ट्रेनिंग प्लस सॉफ्ट टच आदि का कॉम्बिनेशन तो हमारे लिए अंगारक-योग बना देता है। इसी ऊहापोह में आधा घंटा देर से ट्रेनिंग पर पहुंचे। सोचा, घर पर तो भूल ही गए थे कि कौनसा पाँव पहले बाहर निकालें, यहाँ कमरे में घुसने के लिए ही थोड़ा सोच लेते हैं। इतने में ही आवाज़ आई, "पालकी भिजवाएं क्या अंदर आने के लिए - यह आने का समय है?" अंगारक-योग में कोई और हमसे खुद-ब-खुद बुलवाता रहता है: "हम तो आना ही नहीं चाह रहे थे। सी एम डी के सर्कुलर के कारण आ गए। हमारे पांव तो साईं बाबा के मंदिर की ओर ही ले जा रहे थे। ऐसी ट्रेनिंग की बजाय हमें वहीँ ज़्यादा सुकून और सीखने को मिलता है।" --"नथिंग विल गो टू योर सी एम डी; इतने आक्रोश का कारण?" --"सबसे बड़ा कारण तो यही है कि हम केवल अपने वेदों के रचयिता व्यास जी आदि को ही अपना आध्यात्मिक और मोटिवेशनल गुरु मानते हैं, आपको नहीं।' -"'इंटरेस्टिंग.. यह हम खुद को नहीं मानते, आप लोग ही हमें गुरु बना देते हैं!" --नहीं, आप ही अपनी मोटी कमाई से ऐसे इश्तहार छपवाते हैं। हम तो बच्चों का मेट्रिमोनियल एड भी किश्तों में पैसे देकर छपवाते हैं! ऐसी ट्रेनिंगों के बड़े खर्चे के कारण ही हमारा बोनस मारा जाता है। दीवाली पर पिछले साल के दिये ही ढूढ़ते रहते हैं!" --"ट्रूली, इट विल नॉट गो टू योर बॉस; टेल मी - आप मेरी जगह फिर किसको यहाँ चाहते है?" ..हम भी नरम हुए: "सर, हमारे कप्तान मौसम के झंझावातों में यात्रियों से भरे जहाज़ को सकुशल निकाल ले जाते हैं; केबिन-क्रू सेवा-श्रूषा करते नहीं थकते; विपरीत परिस्थितियों में हम टाई खिंचवाते हार नहीं मानते --फिर आप अब हमारा क्या "परिवर्तन" करने आए हैं?..फिर भी अगर कुछ समझाना ज़रूरी है तो हमारे इस बड़े परिवार में ही कई प्रतिभाशाली लोग मिल जाएंगे; कोई उन्हें ढूँढने का सर्कुलर क्यों नहीं निकालता?" ..और तभी हम टच-स्क्रीन मोबाइल की घंटी सुनकर घबरा गए जो बच्चों ने हमें ऑफ करना ही नहीं सिखाया था कि बायें से दायें स्वाइप करना है या दायें से बायें। सर जी ने ताना कसा: "मन मोहन सिंह कालिंग!' और सब ही-ही करने लगे जो अभी तक हमारे साथ थे। हमने हड़बड़ी में दरवाज़े के पास खड़े भाई को फ़ोन देकर कहा कि ज़रा बाहर जाकर मैसेज ले लो और इसे अपने पास ही रखना। मन मोहन जी पर हंसना हमें अच्छा नहीं लगा। सॉफ्ट-स्किल्स के टॉप पर तो वही हैं। बिना बोले ही सारा काम चला लेते हैं! (..और हम एक स्माइली से ही खुश हो जाते हैं!)  ☺     

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